Saturday, February 17, 2018

राष्ट्रीय किसान आयोग

प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग की स्थापना 18 नवम्बर 2004 को की गई थी. देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं के कारण इसका गठन किया गया था. यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किसानों की समस्या का समाधान भी शामिल था. आयोग ने पहले दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, दिसम्बर 2005 और अप्रेल 2006 में अपनी चार रिपोर्टें दीं. इसके बाद 4 अक्तूबर 2006 को अपनी पाँचवीं और अंतिम रिपोर्ट दी.
आयोग ने खाद्य और पुष्टाहार सुरक्षा के लिए एक मध्यावधि-नणनीति बनाने, कृषि उत्पादकता, लाभ और खेती-बाड़ी की व्यवस्था को सुदृढ़ करने, युवा वर्ग को खेती की तरफ आकर्षित करने, नीतिगत सुधारों, कृषि-अनुसंधान पर निवेश बढ़ाने और समेकित विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सुझाव दिए थे. इनमें से एक सुझाव यह भी था कि गेहूँ और धान के अलावा दूसरी फसलों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की जानी चाहिए. आयोग का सुझाव था कि किसान को भारित औसत लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा कीमत दी जानी चाहिए.
अन्न का औसत लागत मूल्य क्या होता है?
स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारित औसत लागत को परिभाषित नहीं किया था. अलबत्ता देश के कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) ने भारित लागत को तीन तरह से परिभाषित किया है. इन्हें A2, A2+FL और C2 कहा जाता है. A2 के अंतर्गत किसानों द्वारा बीज, खाद, रसायन, मजदूरों, ईंधन, सिंचाई वगैरह पर हुआ खर्च शामिल होता है. A2+FL में उपरोक्त लागतों के, जिनका भुगतान कर दिया गया है, अलावा परिवार के श्रम को भी शामिल किया जाता है, जिसका भुगतान नहीं किया गया.
C2 लागत और ज्यादा व्यापक है. इसमें उपरोक्त दो लागतों के अलावा जमीन और खेती से जुड़ी दूसरी अचल सम्पदा के किराए और ब्याज वगैरह को भी शामिल किया जाता है. भारत के आम बजट में सरकार ने किसान की लागत के मूल्य पर 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की जो घोषणा की है, उसमें यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार का आशय उपरोक्त तीनों में से किस लागत से है.
ब्लू मूनकी गणना कैसे होती है?
ब्लू मून का मतलब है साल में एक अतिरिक्त पूर्णमासी का होना. या किसी महीने में एक के बजाय दो पूर्ण चंद्र. इसी तरह एक मौसम में तीन के बजाय चार पूर्ण चंद्र. चूंकि ऐसा बहुत कम होता है इसलिए इसे मुहावरा बना दिया गया, ‘वंस इन ए ब्लू मून.वैसे ही जैसे ईद का चाँद.सामान्यतः एक कैलेंडर महीने में एक रात ही पूर्ण चंद्रमा दिखाई देता है. चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की काल गणना में संगति बैठाने के लिए प्राचीन यूनानी खगोल-विज्ञानी एथेंस के मेटोन ने गणना करके बताया कि 19 साल में 235 चंद्रमास (228 सौरमास) और 6940 दिन होते हैं. इस प्रकार 19 साल का एक मेटोनिक चक्र होता है. आपने देखा कि इन 19 साल में 234 चंद्रमास हैं जबकि कैलेंडर में 228 महीने हैं. इस प्रकार इन 19 साल में (234-228=7) सात अतिरिक्त पूर्णचंद्र होंगे. इस 19 वर्ष की अवधि में यदि किसी साल फरवरी में पूर्णमासी नहीं होती है (जैसाकि इस साल है) तब एक ब्लू मून और बढ़ जाता है.
पिछली 31 जनवरी 2018 से पहले 31 जुलाई 2015 को ब्लू मून था. अब इसके आगे की तारीखें हैं 31 मार्च, 2018, 31 अक्तूबर, 2020, 31 अगस्त, 2023, 31 मई, 2026, 31 दिसम्बर, 2028, 30 सितम्बर, 2031, 31 जुलाई, 2034. आपने गौर किया होगा कि 31 जुलाई 2015 के ठीक 19 साल बाद उसी तारीख यानी 31 जुलाई 2034 को ब्लू मून होगा.
टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन?
टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन का मतलब होता है, छोटे नाभिकीय अस्त्र. नाभिकीय अस्त्र बड़े स्तर पर भारी संहार करता है. उनका इस्तेमाल वास्तविक युद्धक्षेत्र से दूर शत्रु-देश की सीमा के काफी भीतर जाकर किया जाता है, जबकि इन छोटे हथियारों का इस्तेमाल छोटे युद्धक्षेत्र में किया जा सकता है. इनमें ग्रेविटी बम, कम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें, तोप के गोले, पलीते वगैरह होते हैं. इन हथियारों के इस्तेमाल से बड़े आणविक युद्ध का खतरा पैदा हो सकता है. हाल के वर्षों में पाकिस्तानी सेना ने भारत को धमकियाँ दी हैं कि यदि कभी सीमा पार की तो हम टैक्टिकल न्यूक्लियर वैपन का इस्तेमाल करेंगे.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दुनिया का पहला संचार उपग्रह

सन 1960 में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने गुब्बारे के आकार का एक उपग्रह इको-1 (Echo-1) छोड़ा था, जो दुनिया का पहला संचार उपग्रह था। यह उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में करीब 1600 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थापित हुआ था। स्थापना के बाद फुलाकर इसका आकार करीब 30 मीटर (100 फुट) कर दिया गया। यह बैलून मायलार (Mylar ) नाम की सामग्री से बना था। मायलार पर अल्युमिनियम की कोटिंग की गई थी, जिससे वह किरणों और तरंगों के परावर्तित करती थी।

धरती से भेजे गए रेडियो सिग्नल उपग्रह की सतह से परावर्तित होकर धरती पर वापस आते, पर वे ट्रांसमिशन केंद्र से काफी दूर तक पहुँच जाते। इससे संचार उपग्रहों की अवधारणा का विकास हुआ। इको-1 ने अमेरिका और यूरोप के बीच काफी अरसे तक ध्वनि, संगीत और चित्रों का प्रसारण किया। सन 1968 में यह उपग्रह आकाश से गायब हो गया।

कंक्रीट और सीमेंट क्या एक ही चीज है?
नहीं, ये दो अलग-अलग चीजें हैं। अक्सर जब लोग सीमेंट की दीवार या सीमेंट की सड़क कहते हैं, तब उनका आशय कंक्रीट से होता है। कंक्रीट और सीमेंट दोनों ही इमारती सामग्रियाँ हैं, पर दोनों एक ही चीज नहीं हैं। सीमेंट उस मिश्रण का एक हिस्सा है, जिसे कंक्रीट कहते हैं। सीमेंट को चूने और सिलिका से बनाया जाता है। सीमेंट में ये दोनों चीजें करीब 85 फीसदी होती हैं। इसके अलावा उसमें कैल्शियम, आयरन, अल्युमिनियम और कुछ दूसरी चीजें भी हो सकती हैं।

बड़ी भट्ठियों में इस मिश्रण को तेज तापमान (करीब 2,700 से 3,000 डिग्री फैरेनहाइट) पर मिलाया जाता है। इसके बाद जो चीज बनती है उसे क्लिंकर कहते हैं। क्लिंकर छोटी गोलियों की शक्ल में होता है। इन गोलियों को पीसकर पाउडर बनाया जाता है और इसमें जिप्सम मिलाया जाता है। यह होता है सीमेंट। सीमेंट में जब पानी मिलाया जाता है तो रासायनिक क्रिया होती है और सूखने के बाद यह पेस्ट कड़ा हो जाता है। वस्तुतः सीमेंट चीजों को जोड़ने का काम करता है।

सीमेंट भी दो प्रकार का होता है। एक, हाइड्रॉलिक और दूसरा, नॉन-हाइड्रॉलिक। हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी की मदद से कड़ा होता है। यह कड़ा होता जाता है और अंत में इसपर पानी का असर बंद हो जाता है। ऐसा सीमेंट उन जगहों के लिए उपयोगी होता है, जहाँ पानी काफी हो। नॉन-हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी मिलाने पर कड़ा नहीं होता। आमतौर पर प्रचलत सीमेंट को पोर्टलैंड या ऑर्डिनरी पोर्टलैंड सीमेंट कहते हैं। यह इमारतों के निर्माण के काम में आने वाला हाइड्रॉलिक सीमेंट है। इसे 18वीं सदी में ब्रिटेन के जोसफ एस्पडीन ने बनाया था।

इस श्रेणी के सीमेंट की भी कई किस्में होती हैं। कंक्रीट में सीमेंट, पानी और कुछ दूसरी चीजों जैसी रोड़ी-बजरी, रेत और पत्थरों का मिश्रण होता है। इनकी मात्रा जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा होती है। निरंतर कठोर बने रहने की क्षमता के कारण कंक्रीट दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली निर्माण सामग्री है।

ई-मेल को डिलीट कर देने के बाद वह कहाँ चली जाती है?
ई-मेल आपके मेल बॉक्स से तो हट जाती है, पर वह पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि उसकी जगह बदल जाती है। कम्यूटर के नजरिए से वस्तुतः कोई भी चीज डिलीट नहीं होती। जब कोई चीज लिखी जाती है, तो उसे मिटाया नहीं जाता, बल्कि उसके ऊपर दूसरी चीज लिख दी जाती है। यानी ओवरराइट हो जाती है। जब आप अपना ई-मेल डिलीट करते हैं या कम्यूटर के रिसाइक्लिंग बिन की फाइलों को डिलीट करते हैं, तो आप उन्हें देखना बंद कर देते हैं और उसके ऊपर नया डेटा आ जाता है। कम्प्यूटर विशेषज्ञ ऐसे डेटा को भी रिकवर कर सकते हैं, जो डिलीट कर दिया गया है। हाँ यह संभव है कि उसमें कुछ खराबी आ जाए। 
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Monday, February 5, 2018

विश्व की पहली रोबो नागरिक

सोफिया पहली पूर्ण रोबोट है, जो मनुष्य की तरह व्यवहार कर सकती है, हालांकि उसका व्यवहार अभी काफी शुरुआती स्तर का है. उसे फिल्म अभिनेत्री ऑड्री हैपबर्न की शक्ल दी गई है. सोफिया को हांगकांग की कम्पनी हैंसन रोबोटिक्स (Hanson Robotics) ने तैयार किया है. उसे बनाने में कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) के विशेषज्ञों और गूगल की पितृ कम्पनी अल्फाबेट इनकॉरपोरेशन की मदद ली गई है, जिसने उसे आवाज पहचानने की क्षमता दी है और सिंगुलैरिटीनेट (SingularityNET) ने उसके दिमाग को तैयार किया है. 25 अक्तूबर 2017 को सऊदी अरब सरकार ने उसे नागरिकता देने की घोषणा भी की है. इस प्रकार वह दुनिया की पहली रोबो नागरिक बन गई है. दिसम्बर 2017 में सोफिया को भारत में पहली बार आईआईटी, बॉम्बे के टेकफेस्ट समारोह में पेश किया गया.
सोफया बातचीत करती है और उसके चेहरे पर हाव-भाव भी आते हैं. वह पूर्व निर्धारित विषयों पर विचार-विमर्श कर सकती है. उसके जवाब पूर्व निर्धारित होते हैं. उसका सम्पर्क क्लाउड नेटवर्क से होता है, जहाँ से वह उत्तर प्राप्त करती है. उसकी आँखों की जगह पर लगे कैमरा अलग-अलग चेहरों को पहचान सकते हैं. इसे सन 2015 में बनाया गया था, पर उसके पैर जनवरी 2018 में ही सक्रिय किए गए हैं. कृत्रिम मेधा विशेषज्ञ अनुभव के आधार पर उसका निरंतर विकास कर रहे हैं. सोफिया के अलावा हैंसन रोबोटिक्स ने उसके कुछ साथी और बनाए हैं. इनके नाम हैं एलिस, अल्बर्ट आइंस्टाइन ह्यूबो, बीना48, हान, ज्यूल्स, प्रोफेसर आइंस्टाइन, फिलिप के डिक एंड्रॉयड, ज़ेनो और जो कैओटिक.  
राजकोषीय घाटा?
राजकोषीय घाटा तब होता है, जब सरकार का कुल खर्च उसके राजस्व से ज्यादा हो जाए. राजस्व घाटे का मतलब हमेशा वास्तविक राजस्व वसूली में कमी नहीं होती. सरकारी व्यय ज्यादा होने पर भी घाटा होता है. इस घाटे की भरपाई आमतौर पर केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) से उधार लेकर की जाती है या छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड के जरिए पूंजी बाजार से फंड जुटाया जाता है. घाटा पूरा करने के मकसद से ली गई उधारी पर सरकार को जो ब्याज देना पड़ता है, उसे राजकोषीय घाटे में से कम करने पर हासिल धनराशि को प्राथमिक घाटा कहेंगे. वास्तविक राजस्व वसूली उम्मीद से ज्यादा होने पर रेवेन्यू सरप्लस की स्थिति पैदा होती है.
राजकोषीय घाटे को लेकर अर्थशास्त्रियों की कई धारणाएं हैं. जॉन मेनार्ड कीन्स की धारणा थी कि राजस्व घाटा, देशों को मंदी से बचाता है. परम्परागत समझ है कि बजट में संतुलन होना चाहिए. अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में राजकोषीय घाटे की सकारात्मक भूमिका भी रही है. जब संयुक्त राज्य अमेरिका बन ही रहा था, तब वित्तमंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने सुझाव दिया कि गृहयुद्ध के दौरान लिए गए कर्जों को चुकता करने के लिए बॉण्ड जारी किए जाएं. इन कर्जों पर ब्याज देने के कारण राजकोषीय घाटा पैदा हो रहा था. जब 1860 के दशक में सारे कर्ज निपट गए तो घाटा भी खत्म हो गया.
इसके बाद के सभी युद्धों के खर्च के लिए अमेरिका ने कर्जे लिए. पहले और दूसरे विश्वयुद्धों के दौरान जीडीपी के 17 और 24 फीसदी तक का घाटा था. चालू वित्त वर्ष में अमेरिकी सरकार का घाटा 440 अरब डॉलर का है, जो जीडीपी का 2.5 फीसदी है. सन 2017-18 के भारत के आम बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य था जीडीपी का 3.2 फीसदी.  
पूँजीगत खर्च क्या होता है?
आम बजट में और कम्पनियों की बैलेंस शीट में पूँजीगत व्यय (Capex) का उल्लेख होता है. यह खर्च कम्पनी या देश की अचल (फिक्स्ड) सम्पदा जैसे भवन, वाहन, उपकरण या भूमि वगैरह को खरीदने पर होता है. यह खर्च इस सम्पदा की खरीद के अलावा वर्तमान सम्पदा की जीवनावधि को बढ़ाने, मसलन रिपेयर वगैरह पर भी हो सकता है.
दावोस शिखर सम्मेलन?
दावोस स्विट्जरलैंड का एक शहर है, जो हर साल जनवरी के उत्तरार्ध में होने वाले आर्थिक शिखर-सम्मेलन के कारण प्रसिद्ध हुआ है. इस बैठक में दुनिया के ढाई हजार के आसपास बिजनेस लीडर जमा होते हैं. उनके अलावा विभिन्न देशों के राजनीतिक नेता, अर्थशास्त्री और सरकारी अधिकारी भी यहाँ जमा होते हैं. इस सालाना सम्मेलन के अलावा व‌र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम साल में छह से आठ क्षेत्रीय बैठकें भी आयोजित करता है. ये बैठकें अफ्रीका, पूर्वी एशिया, लैटिन अमेरिका और दूसरे इलाकों में आयोजित होती हैं. इनके अलावा दो सालाना बैठकें चीन और संयुक्त अरब अमीरात में भी होती हैं.
व‌र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, जिनीवा स्थित एक गैर-सरकारी संस्था है, जो वैश्विक प्रश्नों पर विचार करती है. हर साल स्विट्ज़रलैंड के दावोस शहर में होने वाली बैठक के कारण यह प्रसिद्ध है. इस बैठक में दुनिया भर के उद्योगपति, राजनैतिक नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी हिस्सा लेते हैं. एक-प्रकार से यह संस्था सरकारों और निजी उद्योग जगत के बीच सेतु का काम भी करती है. इस संस्था की शुरुआत 1971 में क्लॉस मार्टिन शाबे नाम के बिजनेस प्रोफेसर ने जिनीवा में की थी. तब इसका नाम था युरोपियन मैनेजमेंट फोरम. तब यह एक तरह से बिजनेस से जुड़े लोगों की संस्था थी. धीरे-धीरे इसका रूप बदलता गया और 1987 में इसका नाम वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम हो गया.


Sunday, January 28, 2018

उच्चायोग और दूतावास में अंतर?

सामान्यतः दो देश एक-दूसरे के यहाँ अपने प्रतिनिधि को राजनयिक सम्पर्क के लिए राजदूत नियुक्त करते हैं। राजदूत और उच्चायुक्त वस्तुतः एक ही हैं। राष्ट्रमंडल देशों के आपसी प्रतिनिधियों के लिए एम्बैसी की जगह हाई कमीशन शब्द का इस्तेमाल होता है। यानी गैर-राष्ट्रमंडल देश या वहाँ के प्रतिनिधि में राजदूत होते हैं और राष्ट्रमंडल देश में उच्चायुक्त। 
आसियान देश क्या हैं?
दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) को संक्षेप में आसियान कहते हैं। यह दस दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का समूह है, जिसका लक्ष्य आपसी आर्थिक विकास और समृद्धि को बढ़ावा देना और क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करना है। इन देशों के शासनाध्यक्ष इस साल भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे।
आसियान का मुख्यालय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में है। आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में की गई थी। इसके संस्थापक सदस्य थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस और सिंगापुर थे। ब्रूनेई इसमें 1984 में शामिल हुआ और 1995 में वियतनाम। इनके बाद 1997 में लाओस और म्यांमार इसके सदस्य बने। कंबोडिया 1999 में इसका सदस्य बना। 1976 में आसियान की पहली बैठक में बंधुत्व और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए गए।
सन 1994 में आसियान ने एशियाई क्षेत्रीय फोरम (एशियन रीजनल फोरम) (एआरएफ) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सुरक्षा को बढ़ावा देना था। अमेरिका, रूस, भारत, चीन, जापान और उत्तरी कोरिया सहित एआरएफ के 23 सदस्य हैं। भारत, 1992 में आसियान का क्षेत्रीय संवाद भागीदार और 1996 में पूर्ण संवाद भागीदार बना। देश की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में आसियान की महत्वपूर्ण भूमिका है।
अपने प्रभाव और आर्थिक सहयोग के कारण आसियान दुनिया के सफलतम समूहों में से एक माना जाता है। सन 2015 में इस संगठन से जुड़े देशों की सकल अर्थ-व्यवस्था 2।8 ट्रिलियन डॉलर की थी। यूरोपीय संघ की तर्ज पर आसियान को भी एकीकृत अर्थ-व्यवस्था की शक्ल देने के प्रयास हो रहे हैं। 18-20 नवंबर, 2015 को मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में हुए इसके 27वें शिखर सम्मेलन में इन देशों ने आसियान एकीकृत आर्थिक समुदाय बनाने का फैसला किया था। 31 दिसंबर, 2015 को यह आसियान (एकीकृत) आर्थिक समुदाय अस्तित्व में आ गया। इन दिनों ब्रूनेई के लिम जॉक होई इसके सेक्रेटरी जनरल हैं। आसियान की सर्वोच्च संस्था में राज्यों के प्रमुख होते हैं। इसका 31वाँ शिखर सम्मेलन 10-14 नवम्बर को फिलीपींस की राजधानी मनीला में हुआ। 32वाँ शखर सम्मेलन इस साल अप्रेल में सिंगापुर में होगा।
रायसीना डायलॉग क्या है?
रायसीना डॉयलॉग नई दिल्ली में आयोजित एक सालाना सम्मेलन है, जिसमें वैश्विक प्रश्नों पर विशेषज्ञ अपने विचार रखते हैं। भारत के थिकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और विदेश मंत्रालय के सहयोग से इस संवाद को सिंगापुर के शांग्री-ला डायलॉग के तर्ज पर आयोजित करने की कोशिश है। यह संवाद 2016 से चल रहा है और तीसरा संवाद 16 से 18 जनवरी 2018 को आयोजित हुआ था, जिसका उद्घाटन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने किया। दिल्ली की रायसीना पहाड़ी के नाम पर इसका नामकरण किया गया है।

Thursday, January 25, 2018

आसियान देश क्या हैं?

दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) को संक्षेप में आसियान कहते हैं. यह दस दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का समूह है, जिसका लक्ष्य आपसी आर्थिक विकास और समृद्धि को बढ़ावा देना और क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करना है. इसका मुख्यालय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में है. आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में की गई थी. इसके संस्थापक सदस्य थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस और सिंगापुर थे. ब्रूनेई इसमें 1984 में शामिल हुआ और 1995 में वियतनाम। इनके बाद 1997 में लाओस और म्यांमार इसके सदस्य बने. कंबोडिया 1999 में इसका सदस्य बना. 1976 में आसियान की पहली बैठक में बंधुत्व और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए गए. सन 1994 में आसियान ने एशियाई क्षेत्रीय फोरम (एशियन रीजनल फोरम) (एआरएफ) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सुरक्षा को बढ़ावा देना था. अमेरिका, रूस, भारत, चीन, जापान और उत्तरी कोरिया सहित एआरएफ के 23 सदस्य हैं. भारत, 1992 में आसियान का क्षेत्रीय संवाद भागीदार और 1996 में पूर्ण संवाद भागीदार बना. देश की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ में आसियान की महत्वपूर्ण भूमिका है.

अपने प्रभाव और आर्थिक सहयोग के कारण आसियान दुनिया के सफलतम समूहों में से एक माना जाता है. सन 2015 में इस संगठन से जुड़े देशों की सकल अर्थ-व्यवस्था 2.8 ट्रिलियन डॉलर की थी. यूरोपीय संघ की तर्ज पर आसियान को भी एकीकृत अर्थ-व्यवस्था की शक्ल देने के प्रयास हो रहे हैं. 18-20 नवंबर, 2015 को मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में हुए इसके 27वें शिखर सम्मेलन में इन देशों ने आसियान एकीकृत आर्थिक समुदाय बनाने का फैसला किया था. 31 दिसंबर, 2015 को यह ‘आसियान (एकीकृत) आर्थिक समुदाय’ अस्तित्व में आ गया. इन दिनों ब्रूनेई के लिम जॉक होई इसके सेक्रेटरी जनरल हैं. आसियान की सर्वोच्च संस्था में राज्यों के प्रमुख होते हैं. इसका 31वाँ शिखर सम्मेलन 10-14 नवम्बर 2017 को फिलीपींस की राजधानी मनीला में हुआ. 32वाँ शखर सम्मेलन इस साल अप्रेल में सिंगापुर में होगा.

रायसीना डायलॉग क्या है?

रायसीना डॉयलॉग नई दिल्ली में आयोजित एक सालाना सम्मेलन है, जिसमें वैश्विक प्रश्नों पर विशेषज्ञ अपने विचार रखते हैं. भारत के थिकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और विदेश मंत्रालय के सहयोग से इस संवाद को सिंगापुर के ‘शांग्री-ला डायलॉग’ के तर्ज पर आयोजित करने की कोशिश है. यह संवाद 2016 से चल रहा है और तीसरा संवाद 16 से 18 जनवरी 2018 को आयोजित हुआ था, जिसका उद्घाटन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने किया. दिल्ली की रायसीना पहाड़ी के नाम पर इसका नामकरण किया गया है.

स्कैंडिनेवियाई देश कौन से हैं?

स्कैंडिनेविया उत्तरी यूरोप का इलाका है, जिसकी नॉर्थ जर्मेनिक परम्पराएं हैं. मूलतः स्कैंडिनेविया से आशय होता है डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन के राजतंत्र, पर व्यापक अर्थ में इसमें फिनलैंड और आइसलैंड को भी शामिल कर लिया जाता है. इन्हें नोर्दिक देश भी कहा जाता है.

शराब पीने वाले की साँस से गंध क्यों आती है?

आम धारणा है कि यह गंध शराब पीने वाले मुँह या शरीर में शराब की मात्रा बची रहने के कारण यह गंध आती है, पर ऐसा नहीं है. यह गंध उसके खून में शामिल हो चुकी होती है. जब कोई व्यक्ति अल्कोहल का सेवन करता है तो, जो उसमें मौजूद इथैनॉल बड़ी तेजी से उसके खून में मिल जाता है. इथैनॉल की विशेषता है बहुत जल्दी हवा में घुलकर उड़ जाना. व्यक्ति के शरीर का रक्त जब फेफड़ों से गुजरता है तो उसमें मौजूद इथैनॉल भाप बनकर तेजी से साँस के साथ बाहर आता है. गंध का कारण यही है.

जानवरों को रंग कैसे दिखाई पड़ते हैं?

जो देखता है उसे कोई न कोई रंग तो दीखता ही है. इसलिए कलर ब्लाइंड का मतलब है कुछ जानवरों को सारी चीजें एक रंग में या दो रंगों में नजर आती हैं. चमगादड़ को ध्वनि की तरंगें बेहतर तरीके से समझ आती है. पर वह कलर ब्लाइंड होते हैं. बंदरों में तीन रंग देखने की क्षमता होती है. इंसान एक करोड़ तक रंगों को अलग-अलग पहचान सकता है. कुछ तो इससे ज्यादा रंगों का भेद कर पाते हैं. कुछ पक्षियों में रंग देखने की बेहतरीन क्षमता होती है वे अल्ट्रा वॉयलेट रंग भी देख लेते हैं.




Monday, January 22, 2018

दुनिया का पहला संचार उपग्रह

सन 1960 में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने गुब्बारे के आकार का एक उपग्रह इको-1 (Echo-1) छोड़ा था, जो दुनिया का पहला संचार उपग्रह था. यह उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में करीब 1600 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थापित हुआ था. स्थापना के बाद फुलाकर इसका आकार करीब 30 मीटर (100 फुट) कर दिया गया. यह बैलून मायलार (Mylar ) नाम की सामग्री से बना था. मायलार पर अल्युमिनियम की कोटिंग की गई थी, जिससे वह किरणों और तरंगों के परावर्तित करती थी.
धरती से भेजे गए रेडियो सिग्नल उपग्रह की सतह से परावर्तित होकर धरती पर वापस आते, पर वे ट्रांसमिशन केंद्र से काफी दूर तक पहुँच जाते. इससे संचार उपग्रहों की अवधारणा का विकास हुआ. इको-1 ने अमेरिका और यूरोप के बीच काफी अरसे तक ध्वनि, संगीत और चित्रों का प्रसारण किया. सन 1968 में यह उपग्रह आकाश से गायब हो गया.  
कंक्रीट और सीमेंट क्या एक ही चीज है?
नहीं, ये दो अलग-अलग चीजें हैं. अक्सर जब लोग सीमेंट की दीवार या सीमेंट की सड़क कहते हैं, तब उनका आशय कंक्रीट से होता है. कंक्रीट और सीमेंट दोनों ही इमारती सामग्रियाँ हैं, पर दोनों एक ही चीज नहीं हैं. सीमेंट उस मिश्रण का एक हिस्सा है, जिसे कंक्रीट कहते हैं. सीमेंट को चूने और सिलिका से बनाया जाता है. सीमेंट में ये दोनों चीजें करीब 85 फीसदी होती हैं. इसके अलावा उसमें कैल्शियम, आयरन, अल्युमिनियम और कुछ दूसरी चीजें भी हो सकती हैं.
बड़ी भट्ठियों में इस मिश्रण को तेज तापमान (करीब 2,700 से 3,000 डिग्री फैरेनहाइट) पर मिलाया जाता है. इसके बाद जो चीज बनती है उसे क्लिंकर कहते हैं. क्लिंकर छोटी गोलियों की शक्ल में होता है. इन गोलियों को पीसकर पाउडर बनाया जाता है और इसमें जिप्सम मिलाया जाता है. यह होता है सीमेंट. सीमेंट में जब पानी मिलाया जाता है तो रासायनिक क्रिया होती है और सूखने के बाद यह पेस्ट कड़ा हो जाता है. वस्तुतः सीमेंट चीजों को जोड़ने का काम करता है.
सीमेंट भी दो प्रकार का होता है. एक, हाइड्रॉलिक और दूसरा, नॉन-हाइड्रॉलिक. हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी की मदद से कड़ा होता है. यह कड़ा होता जाता है और अंत में इसपर पानी का असर बंद हो जाता है. ऐसा सीमेंट उन जगहों के लिए उपयोगी होता है, जहाँ पानी काफी हो. नॉन-हाइड्रॉलिक सीमेंट पानी मिलाने पर कड़ा नहीं होता. आमतौर पर प्रचलत सीमेंट को पोर्टलैंड या ऑर्डिनरी पोर्टलैंड सीमेंट कहते हैं. यह इमारतों के निर्माण के काम में आने वाला हाइड्रॉलिक सीमेंट है. इसे 18वीं सदी में ब्रिटेन के जोसफ एस्पडीन ने बनाया था.
इस श्रेणी के सीमेंट की भी कई किस्में होती हैं. कंक्रीट में सीमेंट, पानी और कुछ दूसरी चीजों जैसी रोड़ी-बजरी, रेत और पत्थरों का मिश्रण होता है. इनकी मात्रा जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा होती है. निरंतर कठोर बने रहने की क्षमता के कारण कंक्रीट दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली निमार्ण सामग्री है.
ई-मेल को डिलीट कर देने के बाद वह कहाँ चली जाती है?

ई-मेल आपके मेल बॉक्स से तो हट जाती है, पर वह पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि उसकी जगह बदल जाती है. कम्यूटर के नजरिए से वस्तुतः कोई भी चीज डिलीट नहीं होती. जब कोई चीज लिखी जाती है, तो उसे मिटाया नहीं जाता, बल्कि उसके ऊपर दूसरी चीज लिख दी जाती है. यानी ओवरराइट हो जाती है. जब आप अपना ई-मेल डिलीट करते हैं या कम्यूटर के रिसाइक्लिंग बिन की फाइलों को डिलीट करते हैं, तो आप उन्हें देखना बंद कर देते हैं और उसके ऊपर नया डेटा आ जाता है. कम्प्यूटर विशेषज्ञ ऐसे डेटा को भी रिकवर कर सकते हैं, जो डिलीट कर दिया गया है. हाँ यह संभव है कि उसमें कुछ खराबी आ जाए. 

Sunday, January 14, 2018

कीड़े-मकोड़े पानी पर बिना डूबे कैसे चलते रहते हैं?

आमतौर पर कीड़ों का वजन इतना कम होता है कि वे पानी के पृष्ठ तनाव या सरफेस टेंशन को तोड़ नहीं पाते. पानी और दूसरे द्रवों का एक गुण है जिसे सरफेस टेंशन कहते हैं. इसी गुण के कारण किसी द्रव की सतह किसी दूसरी सतह की ओर आकर्षित होती है. पानी का पृष्ठ तनाव दूसरे द्रवों के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है. इस वजह से बहुत से कीड़े मकोड़े आसानी से इसके ऊपर टिक सकते हैं. इन कीड़ों का वजन पानी के पृष्ठ तनाव को भेद नहीं पाता. सरफेस टेंशन एक काम और करता है. पेन की रिफिल या कोई महीन नली लीजिए और उसे पानी में डुबोएं. आप देखेंगे कि पानी नली में काफी ऊपर तक चढ़ आता है. पेड़ पौधे ज़मीन से पानी इसी तरीके से हासिल करते है. उनकी जड़ों से बहुत पतली पतली नलियां निकलकर तने से होती हुई पत्तियों तक पहुंच जाती हैं. सन 1995 में प्रतिमाओं के दूध पीने की खबर फैली थी. वस्तुतः पृष्ठ तनाव के कारण चम्मच का दूध पत्थर की प्रतिमा में ऊपर चढ़ जाता था. इसे लोगों ने प्रतिमाओं का दूध पीना घोषित कर दिया.
रबी, खरीफ और जायद में फर्क क्या है?
भारत में ऋतुओं पर आधारित तीन प्रकार की फसलें होती हैं।
रबीः-शीत ऋतु की फसलों को रबी कहा जाता है| इन फसलों को अक्टूबर से दिसंबर के बीच मे लगाया जाता है| फरवरी से अप्रैल के बीच मे इनकी कटाई होती है| रबी में मुख्यतः गेहूं, मटर,चना वगैरह उगाए जाते हैं।

खरीफः-वर्षा ऋतु की फसल होती है खरीफ। इसे मई से जुलाई के बीच मे लगाया जाता है और इनकी कटाई सितम्बर और अक्टूबर के बीच मे की जाती है | इसमें धान, मक्का, जूट, सोयाबीन, बाजरा, कपास, मूँगफली, शकरकन्दग, उर्द, मूँग, लोबिया, ज्वार, तिल, ग्वा,र, जूट, सनई, अरहर, ढैंचा, गन्नाम, सोयाबीन, भिंण्डीर वगैरह को उगाया जाता है।

जायदः- इसे पूरे साल कृत्रिम सिंचाई के माध्यम से उगाया जाता है | ये दो प्रकार की होती है- जायद रबी और जायद खरीफ | जायद खरीफ की फसल को अगस्त से सितम्बर के बीच मे बोते हैं और इसकी कटाई दिसंबर और जनवरी के बीच मे होती है| जायद खरीफ फसल के मुख्य उदहारण है- धान,ज्वार,कपास इत्यादि| जायद रबी की फसल को फरवरी से मार्च के बीच मे बोया जाता है और इसकी कटाई अप्रैल और मई के बीच मे होती है| जायद रबी फसल के मुख्य उदहारण है- खरबूज,तरबूज,सब्जियाँ इत्यादि|
अब पॉली हाउस की मदद से अलग-अलग मौसम में भी खेती हो रही है।

लक्ष्मीतरु क्या है?


लक्ष्मी तरु या सिमारूबा ग्लाउका ( Simarouba Glauca DC) मूलत: उत्तरी अमेरिका का पेड़ है. इसके बीजों से खाद्य तेल बनता है तथा अन्य भाग भी बहुत उपयोगी हैं. इसके बीज से 60 प्रतिशत तक तेल निकाला जा सकता है, जो बायो डीजल का काम करेगा. उससे वाहनों को भी चलाया जा सकेगा. इसे "स्वर्ग का पेड़" (पैराडाइज ट्री) कहा जाता है. नीम और तुलसी की तरह इस पेड़ के औषधीय गुण भी हैं. चिकनगुनिया जैसे बुखार, गैस्ट्रायटिस और अल्सर वगैरह में यह लाभकारी है. देश के कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में इस पर शोध चल रहा है.
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित