Monday, March 21, 2011

आम बजट और रेल बजट अलग-अलग क्यों

भारतीय संसद में प्रतिवर्ष रेल बजट एवं सामान्य बजट एक साथ पेश न करके अलग-अलग क्यों पेश किए जाते हैं?
 हरि नारायण लाल, 192/आई, चंद्र सदन, शिवापुरम, पूर्वी बशारतपुर, गोरखपुर(उप्र)


संविधान के अनुच्छेद-112 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बंध में संसद के दोनों सदनों के सामने भारत सरकार की उस वर्ष के लिए प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएंगे, जिसे वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है। यह बजट सामान्यतः फरवरी की अंतिम तिथि को पेश किया जाता है और 1 अप्रेल से लागू होता है। यदि किसी कारण से वर्ष का बजट पेश न हो सके तो सरकार को जरूरी खर्च के लिए संचित निधि में से धन निकालने के लिए अनु्छेद-116 के अंतर्गत संसद अनुदान मांगें पास कर सकती है। 


भारतीय रेल भी सरकार का उपक्रम है। इसका अलग बजट बनाने की परम्परा सन 1924 से शुरू हुई है। इसके लिए 1920-21 में बनाई गई विलियम एम एकवर्थ कमेटी ने रेल बजट को सामान्य बजट से अलग पेश करने का सुझाव दिया था। 1920-21 मे सरकार का कुल बजट 180 करोड़ का था, जबकि इसमें 82 करोड़ रु का रेल बजट था। अकेला रेल विभाग देश की अकेली सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि संचालित करता था। इसलिए उसका बजट अलग तैयार करने का सुझाव दिया गया। अब अनेक विशेषज्ञ रेल बजट को आम बजट का हिस्सा बनाने का सुझाव देते हैं। रेल बजट आम बजट से दो दिन पहले पेश होता है और आम बजट में रेलवे की प्राप्तियों और व्यय का विवरण दिया जाता है। 


कादम्बिनी के मार्च अंक में ज्ञानकोश कालम के अंतर्गत प्रकाशित   

Sunday, March 20, 2011

Sparrows : some interesting facts



True sparrows, the Old World Sparrows in the family Passeridae, are small passerine birds. As eight or more species nest in or near buildings, and the House Sparrow and Eurasian Tree Sparrow in particular inhabit cities in large numbers, sparrows may be the most familiar of all wild birds.Fortunately, they are still found in many parts of the world. They are also one of the oldest companions of human beings and have, over a period of time, evolved with us.

 The House Sparrow was one of the most common birds in the world but in the past few years, this bird has seen decline over much of its natural range in both urban and rural habitats. The decline of the House Sparrow is an indicator of the continuous degradation of the environment in which we live.

The First World House Sparrow Day was celebrated in different parts of the world on 20 March 2010. It created a global awareness-raising campaign highlighting the need for the protection of the House Sparrow and its habitat.

The rationale of having a event is not only to celebrate the event for a day but to use the day to bring together all the individuals and organisation working on the conservation of House Sparrows and urban biodiversity on a common platform. With the help of the website we aim to build a network which can result in better linkages of like minded people. In the long term its an effective way to carry out advocacy, do collaborative research and form national and international linkages.

The idea of celebrating World House Sparrow Day came up during an informal discussion over tea at the Nature Forever Society's office. The idea was to earmark a day for the House Sparrow to convey the message of conservation of the House Sparrow and other common birds and also mark a day of celebration to appreciate the beauty of the common biodiversity which we take so much for granted.

Still curious? Check out the following links for more information on the House Sparrow.

http://www.worldhousesparrowday.org
http://www.natureforever.org/adopt.html#housesparrow
http://www.natureforever.org/help.html
http://www.birds.cornell.edu/celebration/promote

Earthquakes



Abridged information from different sources

The quake that rocked Japan on March 11, triggering tsunamis from its north-eastern coast near Sendai, was of the magnitude-9, the largest one to ever hit Japan. It occurred at the interface between the Pacific and the North America plates, two of the four major tectonic plates that Japan and its neighbouring islands rest on. “Think of the earth as an egg, with the plates forming the crust, the yolk as the solid core and liquid in between. When a part of the crust breaks away and collides with or slides under another part, the impact of the event will cause ruptures and disturbances along the fault lines,” says Kusala Rajendran, a professor at the Centre for Earth Sciences, Indian Institute of Science, Bangalore, who studies tectonics and crustal processes.

 The Japan Trench has witnessed nine events of magnitude 7 or more since 1973, many of them just a few kilometres from the location of the recent quake. In fact, three of the most recent earthquakes in Japan with a magnitude of eight or more were a result of the Pacific plate (a volatile plate, which moves 30-90 mm per year) moving beneath the North America plate. “It’s like a delicately balanced pile of logs. When you remove one log, the entire structure is disturbed. It may seem to settle down at an angle, but sooner or later, it’s sure to come crashing. Very soon, you might hear of volcanoes erupting in the region and more earthquakes. A major earthquake is never a solitary event—it causes a redistribution of stresses,” says the seismologist.

 In the past year, the Pacific plate has caused three major earthquakes along its corners—Chile, New Zealand and Japan. In the March 13 issue of Newsweek magazine, Simon Winchester writes that the next big quake is likely to occur at the fourth corner of the plate—the San Andreas fault along the west coast of North America. Many seismologists are, however, wary of drawing such conclusions. “Distant triggering has not been understood properly,” says Professor Rajendran.

Other speculations about impending earthquakes are more calculated. At the Cascadia subduction zone, which extends all the way from the Vancouver Island to north California, seismologists expect a tsunamigenic earthquake to occur soon. Having deduced from ancient Japanese records and the age of dead trees in the area that the fault has historically experienced a tsunami every 300 years, the last being the ‘orphan tsunami’ of 1700, they predict an impending earthquake of magnitude 9 or higher.


V Shoba Indian Express





दुनिया में कुल कितने देश हैं?


दुनिया में कुल कितने देश हैंक्या सभी देश संयुक्त राष्ट्र-सदस्य हैं?

दुनिया के पूर्ण सम्प्रभुता सम्पन्न देशों की संख्या 193 है। इनमें से 192 संयुक्त राष्ट्र-सदस्य हैं। वैटिकन सिटी को सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य की मान्य परिभाषाओं में रखा जा सकता है, पर वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं केवल स्थायी पर्यवेक्षक है। वस्तुतः वैटिकन सिटी नहीं रोम के कैथलिक चर्च की प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे होली सी कहा जाता है प्राचीनकाल से चली आ रही है। वैटिकन सिटी का गठन 1929 में हुआ था। उसके 178 देशों के साथ राजनयिक सम्बन्ध भी हैं।

संयुक्त राष्ट्र के 192 सदस्य देशों के अलावा कुछ राजव्यवस्थाएं और हैं, जिन्हें पूर्ण देश नहीं कहा जा सकता । उनके नाम हैं अबखाजिया, कोसोवो, नागोर्नो–कारबाख, उत्तरी सायप्रस, फलस्तीन, सहरावी गणराज्य, सोमालीलैंड, दक्षिण ओसेतिया, ताइवान, और ट्रांसनिस्ट्रिया। ये देश किसी न किसी वजह से राष्ट्रसंघ के पूर्ण सदस्य नहीं हैं। हाल में अफ्रीका में एक नए देश का जन्म हुआ है, जिसका नाम है दक्षिणी सूडान। लम्बे अर्से से गृहयुद्ध के शिकार सूडान में इसी साल जनवरी में एक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें जनता ने नया देश बनाने का निश्चय किया है। यह फैसला देश के सभी पक्षों ने मिलकर किया है। नया देश 9 जुलाई 2011 को औपचारिक ऱूप से जन्म लेगा।
  
दयामृत्यु क्या हैक्या किसी देश में व्यक्ति को अपनी इच्छा से मरने का अधिकार है?

दयामृत्यु का अर्थ है किसी व्यक्ति या प्राणी के जीवन का ऐसी स्थिति में अंत जब समझा जाय कि उसकी मृत्यु उसके जीवित रहने से बेहतर है। इसके कई रूप सम्भव है। मृत्यु का स्वयं वरण, सम्बंधियों और परिजन द्वारा निश्चय या किसी अन्य स्थिति में जीवन का अंत। मृत्यु का वरण निष्क्रिय या सक्रिय दोनों प्रकार से हो सकता है। व्यक्ति को जीवित रखने वाले उपकरण हटा लिए जाएं या इंजेक्शन आदि देकर अंत किया जाए।

हाल में सुप्रीम कोर्ट में अरुणा शानबाग के मामले का फैसला आने के पहले से देश में इस प्रश्न पर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने दया मृत्यु को कानूनी शक्ल दे दी है, साथ ही उम्मीद जाहिर की है कि देश की संसद इस मामले में कोई नियम बनाएगी।

दया मृत्यु पर सारी दुनिया में बहस चल रही है, पर इसे स्वीकार बहुत कम लोग करते हैं। युरोप में अल्बानिया, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, आयरलैंड, जर्मनी और लक्जेमबर्ग में पूर्ण या आंशिक दया मृत्यु की अनुमति है। अमेरिका के ओरेगॉन, वॉशिंगटन और मोंटाना राज्यों में भी इसकी अनुमति है। इस व्यवस्था का अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में विरोध हुआ था, पर अंततः अदालत ने दया मृत्यु को स्वीकार कर लिया। इन राज्यों में अब भी इस कानूनी अधिकार के अनेक पहलू अस्पष्ट हैं। दया मृत्यु के समानांतर इच्छा मृत्यु की अवधारणा है। जैन समाज में संथारा एक पवित्र कर्म है। इसी तरह जापान के परम्परागत समाज में हाराकीरी को योद्धाओं का पवित्र कार्य माना जाता है।    


मोबाइल टेलीफोन सेवाओं को संदर्भ में जीएसएम, जीपीआरएस और सीडीएमए क्या होते हैं?

जीएसएम यानी ग्लोबल सिस्टम फऑर मोबाइल। मोबाइल टेलीफोन की यह सबसे ज्यादा प्रचलित पद्धति है। इनका दुनिया भर में नेटवर्क है और अधिकतर देशों में इसकी रोमिंग सुविधा है। जीएसएम एसोसिएशन इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले संगठनों की अंतरराष्ट्रीय संस्था है। इनकी वैबसाइट http://www.gsmworld.com/ पर जीएसएम पभोक्ताओं की लगातार बढ़ती संख्या आती रहती है। अनुमान है कि इस वक्त दुनिया में करीब पाँच अरब जीएसएम फोन हैं। जीएसएम की तरह सीडीएमए भी मोबाइन फोन की एक तकनीक है। इसका पूरा नाम है कोड डिवीजन मल्टिपल एक्सेस। इसे चैनल एक्सेस मैथड भी कहते हैं। जीपीआरएस यानी जनरल पैकेट रेडियो सर्विस एक प्रकार की तेज डेटा सर्विस है जैसे फिक्स्ड लाइन पर ब्रॉडबैंड सेवा होती है।

भारतीय मुद्रा में गांधी जी ग्यारह लोगों के साथ दांडी यात्रा पर दिखाए गए हैं। क्या ये ग्यारह सदस्य ही यात्रा पर गए थे?

महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा 12 मार्च 1930 को शुरू की थी। उनके साथ 78 यात्री और चले थे। 240 मील(करीब 325 किमी) की यह यात्रा 24 दिन में पूरी हुई। रास्ते में हजारों लोगों ने उनका स्वागत किया। बड़ी संख्या में नए लोग उनके साथ यात्रा में शामिल हुए। आपने करेंसी में जो चित्र देखा है वह दिल्ली में मदर टेरेसा क्रेसेंट और सरदार पटेल मार्ग के टी पॉइंट पर स्थापित ग्यारह मूर्तियों का है। यह प्रतीक चित्र है। इसमें सभी यात्रियों को शामिल नहीं किया गया है। इन मूर्तियों के पास यह विवरण भी नहीं है कि इनमें गांधी जी के साथ दूसरे यात्री कौन हैं। यह प्रतिमा प्रसिद्ध मूर्तिकार देवी प्रसाद रॉय चौधरी ने बनाई थी।  


राजस्थान पत्रिका के me next में प्रकाशित

ज्ञानकोश क्या है


 पिछले कुछ साल से मैं मासिक पत्रिका कादम्बिनी में ज्ञानकोश नाम से एक कॉलम लिखता रहा, जो पत्रिका के जून 2017 के अंक तक प्रकाशित हुआ। यह कॉलम इस पत्रिका के एक पुराने कॉलम गोष्ठी का संवर्धित रूप था। हाल में राजस्थान पत्रिका के मी नेक्स्ट  सप्लीमेंट में Knowledge Corner नाम से एक और कॉलम शुरू किया। इसके अलावा प्रभात खबर के सप्लीमेंट अवसर में जिज्ञासा 360 डिग्री नाम से भी एक स्तम्भ प्रकाशित होता है। इनके अलावा आकाशवाणी दिल्ली के एफएम गोल्ड से मेरा साप्ताहिक कार्यक्रम 'बारिश सवालों की' भी प्रसारित होता है। अपने इस ब्लॉग में मैं इन कॉलमों में प्रकाशित सामग्री को रखूँगा। इसके अलावा भी कुछ और जानकारी-परक सामग्री दूँगा। 

ब्लॉग के मार्फत पाठक सीधे संवाद भी कर सकते हैं। जानकारी के अनेक आयाम होते हैं। आप उचित समझें तो  किसी जानकारी के दूसरे आयाम मेरे पास भेजें। मैं उन्हें प्रकाशित करूँगा। मेरी जानकारी की भी सीमा है। भूल-सुधार की संभावना हमेशा रहेगी। आप इसमें भी मेरी मदद करें।