Saturday, April 30, 2011

मोबाइल का आविष्कार कहाँ हुआ और कब हुआ?

शुरूआती मोबाइल फोन के साथ मार्टिन कूपर

मोबाइल का आविष्कार कहाँ हुआ और कब हुआ? भारत में इसका प्रयोग कब से शुरू हुआ?
प्रीति कुमावत, झुँझनु
सोनी एरिकसन का शुरूआती फोन
दुनिया के पहले मोबाइल फोन का प्रदर्शन मोटरोला के डॉ मार्टिन कूपर ने सन 1973 में किया था। इन मोबाइल फोनों के पहले भी रेडियो फोन थे, पर उनमें इस सेल्युलर फोन में अंतर था। वस्तुतः वायरलेस फोन काफी पहले से फौजी इस्तेमाल में आ रहे थे। उनका पहला नागरिक इस्तेमाल 17 जून 1946 को अमेरिका के सेंट लुईंज़, मिज़ूरी में बेल सिस्टम्स मोबाइल टेलीफोन सर्विस के नाम से एक कार से किया गया। इसे कार फोन का नाम दिया गया। इसका वजन था करीब 36 किलोग्राम। दुनिया की पहली ऑटोमेटेड कार फोन सेवा 1960 में स्वीडन में शुरू की गई। इसके उपकरणों का वजन करीब 40 किलो था। इसके बाद 1962 में वैक्यूम ट्यूब्स की जगह जगह ट्रांजिस्टर लगाकर कुछ और आधुनिक फोन सेवा शुरू की गई। 1971 में एमटीडी फोन सेवा शुरू की गई जो 1987 तक चली। पर यह कार फोन था। उस करीके का हैंडसेट नहीं था, जैसा आज हम देखते हैं। मार्टिन कूपर ने 3 अप्रेल 1973 को सबसे पहले अपने प्रतिद्वंदी बैल लैब्स के डॉ जोएल एस एंजेल को फोन करके पहले मोबाइल हैंड सेट का प्रदर्शन किया। दुनिया की पहली कॉमर्शियल सेल्युलर फोन सेवा 1979 में जापान में एनटीटी ने तोक्यो में शुरू की। इसके बाद 1981 में डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन में मोबाइल फोन सेवाएं शुरू हो गईं। इसका नाम था नोर्दिक मोबाइल टेलीफोन (एनएमटी)। 1983 में अमेरिका ने 1-जी टेलीफोन नेटवर्क अमेरिटेक नाम से शिकागो में शुरू किया। भारत में पहली मोबाइल फोन सेवा 15 अगस्त 1995 में दिल्ली में गैर-व्यावसायिक तौर पर शुरू की गई।    



एम्बुलेंस की आवाज़ का आविष्कार किसने किया? इसका रंग लाल और नीला क्यों होता है?
योगेश टिंकर,
आमतौर पर आप एम्बुलेंस की जो आवाज सुनते हैं, वह इलेक्ट्रॉनिक सायरन हैं। एमबुलेंस में सायरन के अलावा फ्लैशिंग लाइट, स्पीकर, रेडियों फोन और अन्य उपकरण होते हैं ताकि सड़क पर उसके लिए लोग रास्ता छोड़ दें। शुरू के सायरन हवा के दबाव से चलते थे। एक दौर में सिर्फ घंटियाँ बजाकर भी काम किया जाता था। आज सबसे प्रसिद्ध ह्वेलेन इलेक्ट्रॉनिक सायरन हैं। एम्बुलेंस को अलग दिखाई पड़ने के लिए चमकदार रंगों से सजाया जाता है। ज़रूरी नहीं कि वह रंग नीला और लाल हो। पीले, हरे, नारंगी और दूसरे रंगों में भी एम्बुलेंस दुनियाभर में पाई जाती हैं। उद्देश्य होता है कि उन्हें लोग जल्द पहचानें और रास्ता छोड़ दें। एम्बुलेंस केवल मोटरगाड़ियों में ही नहीं होतीं। एम्बुलेंस हवाई जहाजों, हेलिकॉप्टरों से लेकर नावों, घोड़ागाड़ियो, मोटर साइकिलों और साइकिलों पर भी होती हैं। एम्बुलेंस में सामने की ओर आपने अक्सर अंग्रेजी के उल्टे अक्षरों में एम्बुलेंस लिखा देखा होगा। इसका उद्देश्य है कि आगे चल रही गाड़ियों के ड्राइवरों को पीछे आती गाड़ी के अक्षर साफ दिखाई पड़ सकें। चूंकि वह दर्पण में उल्टे अक्षर पढ़ पाता है इसलिए उल्टे अक्षर लिखे जाते हैं।

राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित


लोकपाल विधेयक क्या है?


लोकपाल विधेयक क्या है? लोकसभा में अब तक आठ बार आने के बाद भी यह पारित क्यों नहीं हो सका? इसके पास होने से सरकार और राजनैतिक दलों को क्या परेशानी हो सकती है? देश में इससे क्या महत्वपूर्ण बदलाव आ सकते हैं?
बाबूलाल बगरानियाँ, ग्राम परसराम पुराना, जिला झुंझनु(राजस्थान)

लोकपाल शब्द से स्पष्ट है इसका रिश्ता जनता के हितों के संरक्षण से है। इसकी अवधारणा स्कैंडिनेवियाई देशों के ओम्बुड्समैन से आई है। ओम्हुड्समैन सरकारी काम-काज पर नज़र रखते हैं और शासन के खिलाफ जनता की ओर से आई शिकायतों की जाँच करते हैं। स्वीडन की संसद ने सन 1809 में ओम्बड्समैन की नियुक्ति की थी। फिनलैंड में 1919 इसकी नियुक्ति हुई। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा समेत अनेक देशों में इस तरह की शिकायतें सुनने और उनपर कार्रवाई करने की व्यवस्था है। भारत में जनवरी 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में पहले प्रशासनिक सुधार आयोग ने सलाह दी कि देश में दो स्तर पर इस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहे। केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त। देश के 18 राज्यों ने अपने यहाँ लोकायुक्त तैनात किए हैं। केन्द्र में लोकपाल की नियुक्ति के लिए 1968 में पहली बार यह बिल लोकसभा में पेश किया गया। 1969 में बिल पास भी हो गया और राज्यसभा में बिल था कि लोकसभा भंग हो गई। इसके बाद 1971, 77, 85, 87, 96, 98, 2001, 2005 और 2008 में इसे प्राण देने के प्रयास हुए और सफलता नहीं मिली। यह बिल कभी इस कमेटी में पड़ा रहता है और कभी उस में और लोकसभा भंग हो जाती है।

सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार-निरोधी व्यवस्था सीवीसी के दफ्तर से संचालित होती है। सीवीसी का छोटा सा दफ्तर देश के विशाल सरकारी ढाँचे के भ्रष्टाचार को रोक पाने में समर्थ है ही नहीं। सितम्बर 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि हमारी सरकार लोकपाल विधेयक को पास करने में तनिक देरी नहीं लगाएगी। पर ऐसा नहीं हो पाया। सन 2010 में लोकपाल विधेयक का एक प्रारूप तैयार किया गया, पर वह भी संसद में नहीं आ पाया। 18 राज्यों में लोकायुक्त काम कर रहे हैं, पर ज्यादातर प्रभावहीन हैं।

हाल में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले आंदोलन में जन-लोकपाल विधेयक की जर्जा हुई। इसका प्रारूप अन्ना से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायविदों ने बनाया है। इनके अनुसार सरकार दो बिल लाना चाहती है वह अपनी मूल भावना में कमजोर है। प्रधानमंत्री, किसी मंत्री या सांसद के विरुद्ध तभी जाँच शुरू की जा सकेगी जब लोकसभा या राज्यसभा के पीठसीन अधिकारी लोकपाल के पास शिकायत भेजेंगे। साथ ही लोकपाल की सिफारिशें होंगी, वह स्वयंमेव किसी के खिलाफ शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं करा पाएगा। सीबीआई और लोकपाल एक-दूसरे से जुड़े नहीं होंगे। भ्रष्टाचार के आरोप में छह महीने से सात साल तक की सजा हो सकेगी। इस विधेयक में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि उस राशि को वापस लाया जाय जो भ्रष्टाचार के कारण डूब गई है। अन्ना हजारे के सहयोगी जिस बिल का सुझाव दे रहे हैं उसमें प्रधानमंत्री, मंत्रियों और सांसदों के अलावा नोकरशाहों और न्यायपालिका से जुड़े व्यक्तियों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। उनके द्वारा प्रस्तावित जन-लोकपाल अपने तईं कार्रवाई कर सकेगा, भ्रष्टाचार की कम से कम सजा पाँच साल होगी। सीबीआई और केन्द्रीय सतर्कता आयोग लोकपाल के अधीन होंगे। लोकपाल की नियुक्ति के पीछे उद्देश्य है भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावशाली संगठन बनाना, ताकि कठोर कार्रवाई हो सके। अब यह बिल तैयार करने के लिए एक समिति बनाई गई है, इसलिए हमें इंतजार करना चाहे कि किस प्रकार के विधेयक पर सहमति हो पाई है।



राजस्थान में केन्द्र द्वारा घोषित नेशनल पार्क कौन से हैं?
विकास सैनी, मकराना

राजस्थान में राष्ट्रीय पार्कों के नाम हैं 3162 वर्ग किलोमीटर में बना डेज़र्ट नेशनल पार्क(1980), 273.80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बना सरिस्का नेशनल पार्क(1982), 28.73 वर्ग कीलोमीटर क्षेत्र पर बना केवलादेव नेशनल पार्क(1981), 392 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर बना रणथम्बौर नेशनल पार्क(1980) और 250 वर्ग किलोमीटर पर बना दर्रा नेशनल पार्क(2004)।


राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Friday, April 15, 2011

आसमान का रंग नीला क्यों?


धरती के चारों ओर वायुमंडल है। यानी हवा है जिसमें कई तरह की गैसों के मॉलीक्यूल और पानी की बूँदें या भाप है। गैसों में सबसे ज्यादा करीब 78 फीसद नाइट्रोजन है और करीब 21 फीसद ऑक्सीजन। इसके अलावा आरगन गैस और पानी है। इसमें धूल, राख और समुद्री पानी से उठा नमक वगैरह है। हमें अपने आसमान का रंग इन्ही चीजों की वजह से आसमानी लगता है। दरअसल हम जिसे रंग कहते हैं वह रोशनी है। हम जानते हैं कि रोशनी वेव्स या तरंगों में चलती है। हवा में मौजूद चीजें इन वेव्स को रोकती हैं। जो लम्बी वेव्स हैं उनमें रुकावट कम आती है। वे धूल को कणों से बड़ी होती हैं। यानी रोशनी की लाल, पीली और नारंगी तरंगें नजडर नहीं आती। पर छोटी तरंगों को गैस या धूल के कण रोकते हैं। और यह रोशनी टकराकर चारों ओर फैलती है। रोशनी के वर्णक्रम या स्पेक्ट्रम में नीला रंग छोटी तरंगों में चलता है। यही नीला रंग जब फैलता है तो वह आसमान का रंग लगता है।

हमारे वायुमंडल का निचला हिस्सा ज्यादा सघन है। आप दूर क्षितिज में देखें तो वह पीलापन लिए होता है। कई बार लाल भी होता है।

आसमान का रंग तो काला होता है। रात में जब सूरज की रोशनी नहीं होती वह हमें काला नजर आता है। हमें अपना सूरज भी पीले रंग का लगता है। जब आप स्पेस में जाएं जहाँ हवा नहीं है वहाँ आसमान काला और सफेद सूरज नजर आता है। 

इन्द्रधनुष कैसे बनता है?


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इन्द्रधनुष का रिश्ता प्रकाश या रोशनी में मौज़ूद तमाम रंगों से है। रोशनी में कई रंगों की बात सैकड़ों साल पहले वैज्ञानिकों ने समझ ली थी, पर सर आइज़क न्यूटन ने अपनी किताब ऑप्टिक्स में प्रिज्म के मार्फत प्रकाश के रंगों के अलग होने या वापस सफेद रंग में परिणित होने का वैज्ञानिक सिद्धांत बनाया। उन्होंने इसका नाम दिया स्पेक्ट्रम जिसे हम हिन्दी में वर्णक्रम कहते हैं। इन्द्रधनुष प्राकृतिक रूप से नज़र आने वाला स्पेक्ट्रम है।

शाम के समय पूर्व दिशा में तथा सुबह के समय पश्चिम दिशा में या वर्षा के बाद आसमान में लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, तथा बैंगनी रंगों का बड़ा वृत्ताकार वक्र या आर्क दिखाई देता है। वर्षा अथवा बादल में पानी की छोटी-छोटी बूँदों अथवा कणों पर पड़नेवाली सूर्य किरणों का विक्षेपण (डिस्पर्शन) ही इंद्रधनुष के सुंदर रंगों का कारण है। इंद्रधनुष दर्शक की पीठ के पीछे सूरज होने पर ही दिखाई पड़ता है। पानी के फुहारे या झरनों के पास  दर्शक के पीछे से सूर्य किरणों के पड़ने पर भी इंद्रधनुष देखा जा सकता है। आमतौर पर इन्द्रधनुष में लाल रंग सबसे बाहर और बैंगनी रंग सबसे भीतर होता है। पर पानी में किरणों का दो बार परावर्तन हो, तो इंद्रधनुष ऐसा भी बनना संभव है जिसमें वक्र का बाहरी वर्ण बैंगनी रहे तथा भीतरी लाल। इसको द्वितीयक (सेकंडरी) इंद्रधनुष कहते हैं।

तीन अथवा चार आंतरिक परावर्तन से बने इंद्रधनुष भी संभव हैं, परंतु वे बिरले अवसरों पर ही दिखाई देते हैं। वे सदैव सूर्य की दिशा में बनते हैं तथा तभी दिखाई पड़ते हैं जब सूर्य स्वयं बादलों में छिपा रहता है। इंद्रधनुष की क्रिया को सर्वप्रथम दे कार्ते नामक फ्रेंच वैज्ञानिक ने उपर्युक्त सिद्धांतों द्वारा समझाया था। इनके अतिरिक्त कभी-कभी प्रथम इंद्रधनुष के नीचे की ओर अनेक अन्य रंगीन वृत्त भी दिखाई देते हैं। ये वास्तविक इंद्रधनुष नहीं होते। ये जल की बूँदों से ही बनते हैं, किंतु इनका कारण विवर्तन (डिफ़्रैक्शन) होता है। इनमें विभिन्न रंगों के वृतों की चौड़ाई जल की बूँदों के बड़ी या छोटी होने पर निर्भर रहती है।

Wednesday, April 6, 2011

अन्ना हज़ारे कौन हैं?





गांधी की विरासत उनकी थाती है। कद-काठी में वह साधारण ही हैं। सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने मौत को भी धता दे दी थी। उनकी प्लाटून के सारे सदस्य मारे गए थे। ऐसी शख्सियत है किसन बाबूराव हजारे की। प्यार से लोग उन्हें अन्ना हजारे बुलाते हैं। उन्हें छोटा गांधी भी कहा जा सकता है।

अन्ना आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। वह गुस्से में हैं। उन्होंने धमकी दी थी कि लोकपाल विधेयक की तर्ज पर भ्रष्टाचार विरोधी कानून लागू नहीं किया तो वह 5 अप्रैल 2011 से आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे और सरकार ने जब उनकी बात नहीं मानी तो वे आमरण अनशन पर बैठ गए।

पहले भी वह महाराष्ट्र सरकार के पांच मंत्रियों की बलि ले चुके हैं। अन्ना ने आज तक जो सोचा है, उसे कर दिखाया है। उन्होंने शराब में डूबे अपने पथरीले गांव रालेगन सिद्धि को दुनिया के सामने एक मॉडल बनाकर पेश किया। रामराज के दर्शन करने हैं तो उसे देखा जा सकता है। इस काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया। सूचना के अधिकार की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पारिवारिक जिंदगी 
अन्ना की शख्सियत बडे़ अनगढ़ तरीके से गढ़ी हुई है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।

छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई। यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक बुकलेट 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया। मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचते रहते।

जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए। उन्होंने गांव की तस्वीर ही बदल दी। उन्होंने अपनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी। आज उनकी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास में खर्च होता है। वह गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। गांव में एक तरह का रामराज है। गांव में तो उन्होंने रामराज स्थापित कर दिया है। अब वह अपने दल-बल के साथ देश में रामराज की स्थापना की मुहिम में निकले हैं : भ्रष्टाचार रहित भारत।

कुछ और तथ्य

Dr.Kisan Baburao Hazare, popularly known as Anna Hazare (b. June 15, 1938), is an Indian social activist who is especially recognized for his contribution to the development of Ralegan Siddhi, a village in Ahmednagar district, Maharashtra, India and his efforts for establishing it as a model village, for which he was awarded the Padma Bhushan by Govt. of India, in 1992. On April 5, 2011, he has started a fast unto death to make a pressure on union government to enact a law on Lokpal that deals with corruption in public offices.

Anna Hazare was born at Bhingar on 15th June, 1938. He was the eldest grandchild in the family and had his primary school education at Bhingar. During the 1962 Chinese Aggression, Anna responded to a call to join the army. Anna signed up and after due training was assigned to the army supply corps as a driver of a supplies truck. It was between 1962 and the Indo-Pakistan war of 1965 that Anna Hazare was overcome by the urge to seek meaning in life.

In 1965, while on active duty reading supplies to the front during the war near Khemkaran in the Lahore sector, the supplies convoy Hon. Anna Hazare was with, was attacked by a couple of enemy salore Jets leaving most people dead or grievously injured. The vehicle being driven by Hon. Anna Hazare was severely hit, the Jawan (soldier) sitting next to him had his legs blown off. Apart from a sharpnel piece grazing his forehead, Anna Hazare was miraculously unharmed. On thinking about this incident a while later he took this incident to mean that he had been given a new lease of life to spend it in the service of the Country's poor. He made it his life's mission to follow this tenet lucidly expounded by Swami Vivekanand.

Anna opted for voluntry retirement, and armed with a modest pension returned to his native Ralegan Siddhi to serve his community. He resolved not to marry and would start a family for that would have only bound him to family responsibilities of keeping the Kitchen fires well tended to. But he was never able to rid himself of family bonds. Instead of the couple of children his family would have been limited to he was now responsible for the whole community his true family. It was in 1965, during the Indo-Pak war that he had a close brush with death, in the enemy attack. All his colleagues were killed, He considered it to be a virtual rebirth for himself, in a sense, the previous life was over and a new life to begin. He decided to devote rest of his life to social work. When he returned to Ralegan in August 1975, he found that there were 35-40 illicit liquor stills operating in the village . Because of little rain, agriculture output was low and hence some people per force turned to this business. He began his activities with the rehabilitation of this structure out of his own provident fund and the gratuity receipts amounting to about Rs.20,000. He knew that a Mandir is always regarded as a sacred place by the villagers and it would be the right place to bring the people together.

Arrest

Anna Hazare was arrested in 1998 when a defamation suit was filed against him by then Maharashtra Social Welfare minister Babanrao Golap. He was released following public uproar.


Lokpal Bill movement

In 2011, Anna Hazare led a movement for passing a stronger anti-corruption Lokpal (ombudsman) bill in the Indian Parliament. As a part of this movement, N. Santosh Hegde, a former justice of the Supreme Court of India and Lokayukta of Karnataka, Prashant Bhushan, a senior lawyer in the Supreme Court along with the members of the India Against Corruption movement drafted an alternate bill, named as the Jan Lokpal Bill (People's Ombudsman Bill) with more stringent provisions and wider power to the Lokpal (Ombudsman). Hazare decided to start a fast upto death from 5 April 2011 at Jantar Mantar in Delhi, to press for the demand to form a joint committee of the representatives of the Government and the civil society to draft a new bill with more stronger penal actions and more independence to the Lokpal and Lokayuktas (Ombudsmen in the states), after his demand was rejected by the Prime Minister of India Dr. Manmohan Singh

The movement attracted attention very quickly through various media. It has been reported that thousands of people joined to support Mr. Hazare's effort. Almost 150 people are reported to join Mr. Hazare in his fast.[7] This has been joined by people providing their suppport in Internet social media such as twitter and facebook. Many celebrities like Shekhar Kapur, Siddharth Narayan,Anupam Kher, Madhur Bhandarkar, Pritish Nandy, Prakash Raj showed their public support through twitter.

Awards

Padmashree award by government of India in the year 1990
Indira Priyadarshini Vrikshamitra award, by government of India on November 19, 1986 from the hands of Prime Minister of India Rajiv Gandhi.
Krishi Bhushana award by Maharashtra government in 1989.
Felicitation by Ahmednagar Municipal Corporation 15 January 1987
Felicitation by Pune Municipal Corporation.
On April 15, 2008, Kisan Baburao Hazare received the World Bank's 2008 Jit Gill Memorial Award for Outstanding Public Service: "Hazare created a thriving model village in Ralegan Siddhi, in the impoverished Ahmednagar region of Maharashtra state, and championed the right to information and the fight against corruption." From Wikipedia



Salient features of Jan Lokpal Bill


Drafted by Justice Santosh Hegde, Prashant Bhushan and Arvind Kejriwal, this Bill has been refined on the basis of feedback received from public on website and after series of public consultations. It has also been vetted by and is supported by Shanti Bhushan, J M Lyngdoh, Kiran Bedi, Anna Hazare etc. It was sent to the PM and all CMs on 1st December. 



  1. An institution called LOKPAL at the centre and LOKAYUKTA in each state will be set up

  2. Like Supreme Court and Election Commission, they will be completely independent of the governments. No minister or bureaucrat will be able to influence their investigations.

  3. Cases against corrupt people will not linger on for years anymore: Investigations in any case will have to be completed in one year. Trial should be completed in next one year so that the corrupt politician, officer or judge is sent to jail within two years.

  4. The loss that a corrupt person caused to the government will be recovered at the time of conviction.

  5. How will it help a common citizen: If any work of any citizen is not done in prescribed time in any government office, Lokpal will impose financial penalty on guilty officers, which will be given as compensation to the complainant.

  6. So, you could approach Lokpal if your ration card or passport or voter card is not being made or if police is not registering your case or any other work is not being done in prescribed time. Lokpal will have to get it done in a month’s time. You could also report any case of corruption to Lokpal like ration being siphoned off, poor quality roads been constructed or panchayat funds being siphoned off. Lokpal will have to complete its investigations in a year, trial will be over in next one year and the guilty will go to jail within two years.

  7. But won’t the government appoint corrupt and weak people as Lokpal members? That won’t be possible because its members will be selected by judges, citizens and constitutional authorities and not by politicians, through a completely transparent and participatory process.

  8. What if some officer in Lokpal becomes corrupt? The entire functioning of Lokpal/ Lokayukta will be completely transparent. Any complaint against any officer of Lokpal shall be investigated and the officer dismissed within two months.

  9. What will happen to existing anti-corruption agencies? CVC, departmental vigilance and anti-corruption branch of CBI will be merged into Lokpal. Lokpal will have complete powers and machinery to independently investigate and prosecute any officer, judge or politician.

बाल फिल्म सोसायटी की स्थापना कब और क्यों की गई?


बाल फिल्म सोसायटी की स्थापना कब और क्यों की गईसरकार ने फिल्मों को पुरस्कार कब से देना शुरू किया?

बच्चों को स्वस्थ मनोरंजन और ज्ञान प्रदान करने के लिए बाल फिल्म सोसायटी बनाई गई थी। इसका काम फिल्में बनाना, वितरित करना और दिखाने की व्यवस्था करना भी था। 11 मई 1955 को इसकी स्थापना हुई थी। इसके पहले अध्यक्ष पं.हृदय नाथ कुंजरू थे। सोसायटी के साथ केदार शर्मा, सत्येन बोस, मोहन कौल, राजेन्द्र शर्मा, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, साई पराँजपे, और तपन सिन्हा जैसे प्रतिष्ठित फिल्मकार जुड़े रहे। सोसायटी वर्कशॉप और फिल्म समारोह भी करती है।  

भारत में फिल्मों के राष्ट्रीय पुरस्कार 1954 में शुरू हुए थे। इनका उद्देश्य सार्थक और रचनात्मक सिनेमा को बढ़ावा देना था। 1973 में फिल्म समारोह निदेशालय की स्थापना होने के बाद से फिल्म पुरस्कार का काम भी निदेशालय के पास चला गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का उद्देश्य देश की सभी भाषाओं के कथा और गैर-कथा चित्रों और उनके अभिनेताओं को पुरस्कृत करना है। हर साल दिल्ली में एक समारोह करके राष्ट्रपति के हाथों यह पुरस्कार दिया जाता है।


स्टेम सेल क्या है



स्टेम सेल क्या है? इसका चिकित्सा विज्ञान में क्या इस्तेमाल है?

स्टेम सेल बहुकोशिकीय जीवों के शरीर की कोशिकाएं या सेल हैं। इनकी खासियत होती है माइटोटिक सेल डिवीजन के तहत इनका खुद बढ़ना। शरीर के भीतर अपने अंगों की मरम्मत करने की प्रणाली है। ज़रूरी होने पर उससे शरीर के भीतर ही क्षतिग्रस्त अंग को उगाने की क्षमता भी होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने नाभि-रज्जु (अम्ब्लिकल कॉर्ड) और अस्थ-मज्जा (बोन मैरो) से खून की कोशिका लेकर उसका कल्चर करके शरीर में प्रवेस कराकर भीतरी अंगों को विकसित करने में सफलता पाई है। ऐसा सम्भव है कि मनुष्य के शरीर का कोई अंग काम करना बंद कर दे तो शरीर स्वयं उस अंग को या तो सुधार दे या नया अंग विकसित कर दे। साठ के दशक में टोरंटो विश्वविद्यालय के अर्नेस्ट ए मैक्यलॉक और जेम्स ई टिल ने इस सिलसिले में बुनियादी अनुसंधान किया था। इस अनुसंधान से चिकित्सा जगत में क्रांति आ गई है। यह इलाज अभी प्रयोग के स्तर पर है और अनेक देशों में इसकी अनुमति नहीं है।  


Sunday, April 3, 2011

अल्पसंख्यकों से दुर्व्यवहार करने वाले देशों पर अंतरराष्ट्रीय कारवाई सम्भव है?


जिन देशों में अल्पसंख्यकों के साथ दोहरा व्यवहार किया जा  रहा है, जहां उनका जीवन और स्वतंत्रता असुरक्षित है, वहां क्या संयुक्त राष्ट्र या किसी दूसरी अंतराराष्ट्रीय संस्था द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है? या फिर केवल वही राष्ट्र उनके हित अहित तय करता है?

सबसे पहले अल्पसंख्यक शब्द के अर्थ को समझें। दुनिया में जातीय, सामुदायिक, वैचारिक धार्मिक, वर्गीय, भाषायी, लैंगिक, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक या किसी दूसरे आधार पर अल्पसंख्यक हो सकते हैं। आधुनिक लोकतंत्र की भावना है कि बहुसंक्यकों की भीड़ में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय न हो। अल्पसंख्यक एक व्यक्ति भी हो सकता है और एक समूह भी। अंतरऱाष्रीय कानून के तहत बच्चों, स्त्रियों और शरणार्थियों के अधिकार भी इसके तहत रखे जाते हैं।

पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1914 से 1920 के बीच ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) ने उत्तरी मेसोपोटामिया के असीरियन लोगों का जबर्दस्त संहार किया गया। अनुमान है कि इस संहार में पाँच से साढ़े सात लाख लोग मारे गए। ऑटोमन साम्राज्य ने ऐसे ही आर्मीनियन और पोंटिक ग्रीक नरसंहार किए, जिनमें करीब 30 लाख अल्पसंख्यक ईसाइयों की हत्या हुई। पहले विश्वयुद्ध के बाद उत्तरी राक का सिमेले नरसंहार भी इसी तरह की एक मिसाल है। इसी तरह नाजी जर्मनी में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान करीब 60 लाख यहूदियों का संहार किया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में अनेक अतरराष्ट्रीय संधियां हुईं हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं नरसंहार अपराध के विरोध में संधि 1948, जातीय भेदभाव के खिलाफ 1965, नागरिक और राजनैतिक अधिकार 1966, आर्थक, सामाजिक र सांस्कृतिक अधिकार 1966, स्त्रियों से भेदभाव 1979, टॉर्चर तथा क्रूरता 1984, बाल अधिकार 1989, इसके अलावा 1992 का संयुक्त राष्ट्र का अल्पसंख्यक अधिकारों का घोषणापत्र भी इसकी एक कड़ी है। हर साल संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा जारी होने वाली मानव विकास रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख होता है कि किन देशों ने इन संधियों की पुष्टि की है। हालांकि संधियों की पुष्टि करने से कोई देश इन अपराधों से मुक्त नहीं हो जाता, पर यह काम धीरे-धीरे ही सम्भव है। और इसमें सभी देशों की सरकारों और जनता की सहमति की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय कारवाई के लिए बड़े स्तर पर आम सहमति बनानी होती है। ऐसी सहमति के तहत ही सूडान के राष्ट्रपति उमर हसन अल-बशीर के खिलाफ दारफुर नर संहार के काऱण गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र ने हाल में लीबिया में जनता को कुचलने की कारवाई के विरोध में फौजी कारवाई की फैसला किया।    



भारत में कुल कितने जिले हैं?




भारत में कुल कितने जिले हैं? क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा और सबसे छोटा जिला कौन सा है? जिला-निर्माण, निर्धारण की अवधारणा क्या है?

भारत के 28 राज्यों और सात केन्द्र शासित क्षेत्रों में जिलों की संख्या नवीनतम अनुमान के अनुसार  687 है। यह पोस्ट जब 2011 में लिखी गई थी, तब 2011 के जनगणना आँकड़े प्राप्त नहीं हुए थे। तब इस पोस्ट में देश के जिलों की संख्या 638 लिखी गई थी। 2011 की जनगणना में यह संख्या 640 थी। 15 सितम्बर 2016 तक का संशोधित विवरण इस प्रकार हैः- 
राज्य (663)- आंध्र 13, अरुणाचल 20, असम 35, बिहार 38, छत्तीसगढ़ 27, गोवा 02, गुजरात 33, हरियाणा 21, हिमाचल 12, जम्मू-कश्मीर 22, झारखंड 24, कर्नाटक 30, केरल 14, मध्य प्रदेश 51, महाराष्ट्र 36, मणिपुर 09, मेघालय 11, मिजोरम 08, नगालैंड 11, उड़ीसा 30, पंजाब 22, राजस्थान 33, सिक्किम 04, तमिलनाडु 32, त्रिपुरा 08, उत्तर प्रदेश 75, उत्तराखंड 13, पश्चिम बंगाल 20, तेलंगाना 10। केन्द्र शासित क्षेत्र(24)- अंडमान निकोबार 03, चंडीगढ़ 01, दादरा-नगर हवेली 02, दमण-दीव 02, लक्षद्वीप 01, दिल्ली 11, पुदुच्चेरी 04।

Updated on Sep 15.2016

No. of districts in each state or UT
Map keyName of State or Union Territory (Italicized)Number of Districts
1Andhra Pradesh13
2Arunachal Pradesh20
3Assam35
4Bihar38
5Chhattisgarh27
6Goa  2
7Gujarat33
8Haryana21
9Himachal Pradesh12
10Jammu and Kashmir22
11Jharkhand24
12Karnataka30
13Kerala14
14Madhya Pradesh51
15Maharashtra36
16Manipur9
17Meghalaya11
18Mizoram8
19Nagaland11
20Odisha30
21Punjab22
22Rajasthan33
23Sikkim4
24Tamil Nadu32
25Tripura8
26Uttar Pradesh75[5]
27Uttarakhand13
28West Bengal20
29Telangana10
AAndaman and Nicobar3
BChandigarh1
CDadra and Nagar Haveli2
DDaman and Diu2
ELakshadweep1
FNCT Delhi11
GPuducherry4
36Total 687

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में जिला एक महत्वपूर्ण इकाई है। केन्द्र सरकार के बाद होती है राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों के अधीन चलने वाली प्रशासनिक व्यवस्था। इसमें पहला स्तर होता है डिवीजन का जो कई जिलों को मिलकर बनता है। उसके नीचे जिला होता है, जो वस्तुतः प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। हालांकि डिलाधिकारी या डिप्टी कमिश्नर प्रदेश सरकार के अंतर्गत काम करते हैं, पर वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य होते हैं। जिलाधिकारी का पद अंग्रेजी शासनकाल में सन 1772 में शुरू किया गया था. यह पद राजस्व संग्रह के लिए था, इसीलिए इसे डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर भी कहते हैं, पर अपने प्रारंभिक काल में जिलाधिकारी के पास राजस्व के अलावा नागरिक मामले, न्याय और फौजी ताकत भी थी। सन 1792 में जिला न्यायाधीश का पद बनाया गया।  

क्षेत्रफल के आधार पर देश का सबसे बड़ा जिला मेरे विचार से गुजरात का कच्छ होना चाहिए। इसका क्षेत्रफल 45, 652 वर्ग किलोमीटर है। यों भारत सरकार की वैबसाइट http://leh.nic.in/ में जम्मू कश्मीर के लेह को सबसे बड़ा जिला कहा गया है जिसका क्षेत्रफल 45110 वर्ग किलोमीटर बताया गया है। देश का सबसे छोटा जिला पुदुच्चेरी का माहे है, जिसका क्षेत्रफल 9 वर्ग किलोमीटर है।
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Saturday, April 2, 2011

पूर्व में है, पर नाम पश्चिमी बंगाल क्यों?


पश्चिम बंगाल राज्य भारत के पूर्वी भाग में स्थित है तो यह पश्चिमी बंगाल कैसे है? पूर्वी बंगाल क्यों नहीं?

आज हम जिसे पश्चिम बंगाल कहते हैं वह समूचे बंगाल का एक हिस्सा है। सन 1757 की प्लासी लड़ाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी की जीत से अंग्रेजी शासन को बुनियादी आधार मिला। अंग्रेजी शासन ने शुरू में कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक कारणों से बंगाल को दो हिस्सों में बाँटने का फैसला किया। इसके पीछे जो भी कारण रहा हो, पर यह स्पष्ट था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र पूर्वी बंगाल बना और हिन्दू बहुल क्षेत्र पश्चिमी बंगाल। 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन हुआ। बंग भंग की इस कारवाई ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की चिंगारी जला दी। विभाजन का भारी विरोध हुआ, पर वह टला नहीं। सन 1906 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आमार शोनार बांग्ला... गीत लिखा, जो सन 1972 में बांग्लादेश का राष्ट्रगीत बना। बहरहाल 1947 में देश के विभाजन के बाद भी बंगाल विभाजित रहा। पूर्वी बंगाल, पूर्वी पाकिस्तान बना और पश्चिमी बंगाल भारत में रहा। वह नाम अबतक चला आ रहा है।    


राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

किस देश में दो राजधानियां हैं?


किस देश में दो राजधानियां हैं?


एक नहीं अनेक देशों में दो राजधानियाँ हैं। एक से ज्यादा राजधानियाँ होने के अलग-अलग कारण हैं। आमतौर पर राजधानी के रूप में एक ही नाम तय होता है, पर व्यावहारिक अर्थ में उनकी संख्या बढ़ जाती है। नीचे कुछ ऐसे देशों के नाम हैं जहां एक से ज्यादा राजधानियाँ हैं।

बेनिनः पश्चिम अफ्रीका के इस देश की घोषित राजधानी पोर्तोनोवो है, पर सरकार के सारे काम देश के सबसे बड़े शहर कोतोनू से होते हैं। वोलीवियाः- लैटिन अमेरिका के इस देश की संवैधानिक राजधानी सुक्रे है, पर प्रशासन देश के दूसरे सबसे बड़े शहर ला पाज़ से चलता है। राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रीय संसद भी वहीं है, इसलिए उसे ही राजधानी माना जाता है। चिलीः-यहां की घोषित राजधानी सांतियागो द चीले है, पर व्यावहारिक राजधानी बालपराइसो है, क्योंकि देश की संसद वहां बैठती है। आयवरी कोस्टः-पश्चिम अफ्रीका के इस देश की आधिकारिक राजधानी जामास्जुक्रू है, पर सारे सरकारी काम पुरानी राजधानी अबीजान में होते हैं और ज्यादातर विदेशी दूतावास भी यहीं हैं। मलेशियाः-राजधानी कुआलालम्पुर है, देश की संसद भी वहीं है, पर देश की सरकार का मुख्यालय सन 1999 में पुत्रजया नाम के शहर में भेज दिया गया। देश की सर्वोच्च अदालत भी वहीं है। नीदरलैंड्सः-हॉलैण्ड या नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम है, पर देश की सरकार, सर्वोच्च अदालत, संसद और राज दरबार सब द हेग में हैं। दक्षिण अफ्रीकाः-यहां की राजधानी प्रीटोरिया है। पर देश की राष्ट्रीय संसद केपटाउन में है और सुप्रीम कोर्ट ब्लोमफोतें में। इस तरह से यहाँ तीन राजधानियां हैं। श्रीलंकाः-श्री जयवर्धनपुरा देश की नई प्रशासनिक राजधानी है, पर व्यावहारिक अर्थ में कोलम्बो भी राजधानी है। ऐसा ही स्वाजीलैंड, तंजानिया और पश्चिमी सहारा में है। सब जानते हैं कि इस्रायल की राजधानी तेल अवीव है, पर इस्रायल अपनी राजधानी यरूशलम मानता है, पर संयुक्त राष्ट्र नहीं मानता। जर्मनी में सुप्रीम कोर्ट कार्लस्रूहे शहर में है, राजनैतिक राजधानी बर्लिन है और अनेक मंत्रालय बॉन में हैं जो पश्चिम जर्मनी की राजधानी थी। 



केन्द्र द्वारा राज्यों को धन देने का क्या सिद्धांत है?


केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को धन देने के क्या सिद्धांत निर्धारित हैं? राज्यों में इसके खर्च और सही उपयोग के लिए केन्द्र कैसे नियंत्रण कर सकता है?

भारत में संघीय राज्यव्वस्था तीन सतह पर काम करती है। केन्द्र, राज्य और केन्द्र शासित क्षेत्र। 1992 में 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज भी इस व्यवस्था में शामिल हो गया है। संविधान के अनुच्चेद 268 से 281 तक राज्यों और केन्द्र के बीच राजस्व संग्रहण और वितरण की व्यवस्था परिभाषित की गई है। देश की अर्थव्यवस्था पंचवर्षीय योजनाओं और वार्षिक बजटों के आधार पर चलतीं हैं। दोश का योजना आयोग इस योजना-व्यवस्था का नियामक है। आर्थिक संसाधनों के संग्रहण और वितरण की व्यवस्था जटिल है। इसके साथ तमाम राजनैतिक, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक भावनात्मक मसले भी जुड़ते हैं। इसलिए यह स्थिर नहीं है। इसमें निरंतर बदलाव चल रहे हैं।

चौथी पंचवर्षीय योजना के पहले हमारे यहाँ साधनों के वितरण की पारदर्शी व्यवस्था नहीं थी। 1969 में प्रसिद्ध समाजशास्त्री डीआर गाडगिल ने क फॉर्मूला बनाया जिसके तहत राज्यों को दी जाने वाली 60 प्रतिशत राशि जनसंख्या के आधार पर 10 प्रतिशत प्रतिव्यक्ति आय पर, 10 प्रतिशत टैक्स वसूली के प्रयत्नों पर, 10 प्रतिशत सिंचाई और बिजली परियोजनाओं पर और 10 प्रतिशत विशिष्ट समस्याओं के आधार पर तय की गई। 1980 में इस फॉर्मूले में संशोधन हुआ। इसके अंतर्त 60 प्रतिशत राशि जनसंख्या पर, 25 प्रतिशत प्रति व्यक्ति आय पर, 7.5 प्रतिशत प्रदर्शन पर और 7.5 प्रतिशत विशिष्ट समस्याओं पर तय किया गया।

संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत भारत के राष्ट्रपति वित्त आयोग का गठन करते हैं। इसका उद्देश्य राज्यों और केन्द्र के बीच राजस्व वितरण की व्यवस्था पर विचार करना है। इस समय 13 वां वित्त आयोग काम कर रहा है। इसका प्रभावी कार्यकाल 2010-2015 है। इसके अध्यक्ष विजय केलकर हैं। केन्द्र-राज्य रिश्तों की बागडोर केन्द्र के हाथ में रहती है। संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत आर्थिक आपतकाल घोषित करने का अधिकार केन्द्र के पास है। इस अधिकार का इस्तेमाल आज तक कभी हुआ नहीं है। 
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