Sunday, December 27, 2015

आईसिस, आईसिल, आईएस? खुद को ‘इस्लामिक स्टेट’ कहने वाले आतंकी संगठन का सही नाम क्या है?

पहले इस संगठन की पृष्ठभूमि को समझना चाहिए। इसकी शुरूआत सन 1999 में जॉर्डन के अबू मुसाब अल-ज़रकाबी ने ‘जमात अल-तौहीद-वल-जिहाद’ नाम से की थी। सन 2004 में अल-ज़रकाबी ने ओसामा बिन लादेन के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए अपने संगठन का नाम कर दिया ‘तंज़ीम क़ायदात-अल-जिहाद फ बिलाद अल-रफीदायन।’ अंग्रेजी में इसका संक्षेप में नाम हुआ ‘अल-क़ायदा इन इराक़ (एक्यूआई)।’ सन 2006 में ज़रकाबी। बावजूद इसके उसका संगठन कायम रहा जिसके कब्जे में इराक का काफी इलाका था।

सन 2013 में इस संगठन ने सीरिया के कुछ इलाकों पर कब्जा करने के बाद अपने संगठन का नाम रखा ‘इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड अल-शाम।’ अरबी भाषा में सीरिया को शाम कहा जाता है। हालांकि ‘अल शाम’ काफी पुराना शब्द है जो सीरिया, लेबनान, इस्रायल, फलस्तीन और जॉर्डन को एक साथ संबोधित करता है। भूमध्य सागर के जिस इलाके को अरबी में अल-शाम कहा जाता है, उसे अंग्रेजी में लैवेंट पुकारा जाता है। यहीं से एक नया अनुवाद हुआ और संगठन को ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लैवेंट’ यानी आईसिल कहा जाने लगा। इसके समांतर दूसरा शब्द चल रहा था ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया’ यानी आईसिस।

जून 2014 में इस ग्रुप के नेता अबू बक्र अल बग़दादी ने इस्लामिक ‘खिलाफत’ के गठन की घोषणा कर दी, जिसका खलीफा खुद को घोषित कर दिया। इसके साथ ही इस संगठन ने घोषणा की कि वह अपने नाम के आगे से इराक और सीरिया हटा रहा है। संगठन का दावा है कि वह इस्लामिक खिलाफत स्थापित कर चुका है। इस तर्क से दुनिया की सभी इस्लामी सरकारें नाजायज हैं और केवल आईएस ही सही है।

पर एक नाम दाएश या दाइश भी चल रहा है? वह क्यों?
‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया’ यानी आईसिस का अरबी अनुवाद है ‘अल-दावला अल-इस्लामिया फ इराक वा अल शाम।’ अरबी मीडिया आईएस को इस नाम से पुकारता है। इसका संक्षेप नाम बना दाएश। पश्चिमी देशों ने इसे एक शब्द बना कर दाएश के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया है। हालांकि अरबी में दाएश जैसा कोई शब्द नहीं है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड केमरन, फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलां, ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री टोनी एबट और अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इसे दाएश कहना शुरू कर दिया है।

पश्चिमी देशों के नेता दाएश नाम को वरीयता क्यों दे रहे हैं?


ऐसा केवल राजनीतिक और वैचारिक कारणों से किया जा रहा है। इस्लामिक स्टेट कहने से इस संगठन को वैधानिकता मिलती है। यानी कोई राज्य स्थापित हो गया है। प्रकारांतर से इसका मतलब यह हुआ कि ‘खिलाफत’ की स्थापना हो गई है, जिसके आगे सभी मुसलिम देशों को झुकना होगा, जबकि ऐसा है नहीं। उसके नाम रखने लेने मात्र से तो कोई नहीं बन जाता। इससे उसका रुतबा बढ़ता है और दुनिया के उन मुसलमानों तक गलत संदेश जाता है, जो मानते हैं कि यह हत्यारों का गिरोह है। यह संगठन दाएश शब्द को नापसंद करता है। यह शब्द रबी के शब्द ‘दाहेश’ से मिलता-जुलता है, जिसका अर्थ है समाज में द्वेष पैदा करने वाला। अब ज्यादातर अरब देश भी इस संगठन को दाएश नाम से पुकारने लगे हैं।

फिर भी सबसे ज्यादा प्रचलित नाम क्या है?


ज्यादातर मीडिया हाउस इस इस्लामिक स्टेट ही लिख रहे हैं, जो नाम संगठन खुद बता रहा है। गूगल पर आधारित ज्यादातर डेटा का निष्कर्ष है कि गैर अरब इलाकों में यह नाम ही सबसे ज्यादा प्रचलित है। इस साल अक्तूबर तक दाएश नाम का इस्तेमाल जीरो के आसपास था। नवम्बर में पेरिस हमले के बाद कुछ समय यह नाम प्रचलन में रहा, पर अब फिर से इस्लामिक स्टेट नाम ही ज्यादा प्रचलन में है।
  
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Friday, December 25, 2015

विश्व में कुल कितने देश हैं?

संयुक्त राष्ट्र की सूची में 206 देशों को तीन वर्गों में बाँटा गया है. इनमें से 193 संयुक्त राष्ट्र-सदस्य हैं. दो पर्यवेक्षक देश हैं और 11 अन्य देश हैं. सम्प्रभुता के लिहाज से देखें तो 190 देश ऐसे हैं, जिनकी सम्प्रभुता को लेकर कोई संदेह नहीं है. सोलह देशों की सम्प्रभुता को लेकर विवाद है. वैटिकन सिटी को सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य की मान्य परिभाषाओं में रखा जा सकता है, पर वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं केवल स्थायी पर्यवेक्षक है. उसके अलावा फलस्तीन भी पर्यवेक्षक देश है. संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों के अलावा कुछ राज-व्यवस्थाएं और हैं, जिन्हें पूर्ण देश नहीं कहा जा सकता. उनके नाम हैं अबखाजिया, कोसोवो, नागोर्नो–कारबाख, उत्तरी सायप्रस, सहरावी गणराज्य, सोमाली लैंड, दक्षिण ओसेतिया, ताइवान, और ट्रांसनिस्ट्रिया. ये देश किसी न किसी वजह से राष्ट्रसंघ के पूर्ण सदस्य नहीं हैं. चार साल पहले अफ्रीका में एक नए देश का जन्म हुआ है, जिसका नाम है दक्षिणी सूडान. लम्बे अर्से से गृहयुद्ध के शिकार सूडान में जनवरी 2011 में एक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें जनता ने नया देश बनाने का निश्चय किया है. यह फैसला देश के सभी पक्षों ने मिलकर किया है. नए देश ने 9 जुलाई 2011 को औपचारिक रूप से जन्म लिया. यह भी संयुक्त राष्ट्र सदस्य है.

दुनिया की सबसे कम जनसंख्या वाले देश का नाम क्या है? 

प्रशांत महासागर में पिटकेयरन सम्भवतः दुनिया की सबसे छोटी आबादी वाला देश है. सन 2013 का अनुमान है कि वहाँ 56 लोग रहते हैं, जो मूल रूप से चार परिवारों के सदस्य है. यह देश ब्रिटिश ओवरसीज़ टैरीटरी है, पर इसकी अपनी संसदीय व्यवस्था है. इस लिहाज से यह दुनिया का सबसे छोटा लोकतंत्र है. तोकेलाओ 1100 और नियू 1500. तुवालू और नाउरू 10,000. वैटिकन सिटी की आबादी करीब 500 है.
भारत को English में Bharat क्यों नहीं लिखा जाता जबकि लगभग सभी देशों का नाम हिंदी और इंग्लिश में एक जैसा होता है.

भारतीय संविधान का पहला अनुच्छेद कहता है कि ‘भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ’ होगा. संविधान के अंग्रेजी पाठ में लिखा है India, that is Bharat, shall be a Union of States. इसका मतलब है कि भारत के दो आधिकारिक नाम हैं. अंग्रेजी में भारत लिखने में भी कोई हर्ज नहीं है और हिन्दी में इंडिया लिखने पर भी.

पोलर लाइट्स क्या है और इनका रहस्य क्या है?

ध्रुवीय ज्योति (अंग्रेजी: Aurora), या मेरुज्योति, वह चमक है जो ध्रुव क्षेत्रों के वायुमंडल के ऊपरी भाग में दिखाई पड़ती है. उत्तरी अक्षांशों की ध्रुवीय ज्योति को सुमेरु ज्योति (अंग्रेजी: aurora borealis), या उत्तर ध्रुवीय ज्योति, तथा दक्षिणी अक्षांशों की ध्रुवीय ज्योति को कुमेरु ज्योति (अंग्रेजी: aurora australis), या दक्षिण ध्रुवीय ज्योति, कहते हैं. यह रोशनी वायुमंडल के ऊपरी हिस्से थर्मोस्फीयर ऊर्जा से चार्ज्ड कणों के टकराव के कारण पैदा होती है. ये कण मैग्नेटोस्फीयर, सौर पवन से तैयार होते हैं. धरती का चुम्बकीय घेरा इन्हें वायुमंडल में भेजता है. ज्यादातर ज्योति धरती के चुम्बकीय ध्रुव के 10 से 20 डिग्री के बैंड पर होती हैं. इसे ऑरल ज़ोन कहते हैं. इन ज्योतियों का भी वर्गीकरण कई तरह से किया जाता है.

मानव शरीर की सबसे छोटी हड्डी का नाम क्या है?

मानव शरीर की सबसे छोटी हड्डी स्टेप्स है, जो कि कान में होती है. उसकी लंबाई 2.5 मिलीमीटर होती है. सबसे लम्बी हड्डी फीमर बोन यानी जाँघ की हड्डी होती है जो 19-20 इंच तक होती है.

हाई वोल्टेज़ तारों पर पक्षी कैसे बैठे रहते हैं?

आपने देखा होगा कि पक्षी एक तार पर बैठते हैं. जब वे तार पर बैठे होते हैं करंट उनके शरीर से प्रवाहित नहीं होता. यह प्रवाह या सर्किट पूरा नहीं होता. यह प्रवाह तभी पूरा होगा जब वे दूसरे तार को छुएं या धरती के किसी स्रोत के सम्पर्क में आएं. आपने देखा होगा कि कई बार बड़े पक्षी बिजली के तारों में फँस कर मर भी जाते हैं. अपने आकार के कारण वे दोनों तारों से छू जाते हैं.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

दिल्ली का इंडिया गेट क्यों और कब बनाया गया था?

नई दिल्ली के राजपथ पर स्थित 43 मीटर ऊँचा द्वार है वह भारत का राष्ट्रीय स्मारक है. यह सर एडविन लुटियन द्वारा डिजाइन किया गया था. इसकी बुनियाद ड्यूक ऑफ कनॉट ने 1921 में रखी थी और 1931 में तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया. मूल रूप से इस स्मारक का निर्माण उन 70,000 ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों की स्मृति में हुआ था जो प्रथम विश्वयुद्ध और अफ़ग़ान युद्धों में शहीद हुए थे. उनके नाम इस स्मारक में खुदे हुए हैं. यह स्मारक लाल और पीले बलुआ पत्थरों से बना हुआ है .

शुरु में इंडिया गेट के सामने अब खाली चंदवे के नीचे जॉर्ज पंचम की एक मूर्ति थी, लेकिन बाद में अन्य ब्रिटिश दौर की मूर्तियों के साथ इसे कॉरोनेशन पार्क में हटा दिया गया. भारत की स्वतंत्रता के बाद, इंडिया गेट पर भारतीय सेना के अज्ञात सैनिक का स्मारक मकबरे भी बनाया गया. इसे अमर जवान ज्योति के रूप में जाना जाता है. सन 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के शहीद सैनिकों की स्मृति में यहाँ एक राइफ़ल के ऊपर सैनिक की टोपी सजाई गई है जिसके चार कोनों पर सदैव अमर जवान ज्योति जलती रहती है. इसकी दीवारों पर हजारों शहीद सैनिकों के नाम खुदे हैं.

भारत में चंदन के पेड़ कहाँ पाए जाते हैं?


भारतीय चंदन का संसार में सर्वोच्च स्थान है. इसका आर्थिक महत्व भी है. यह पेड़ मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है तथा देश के अन्य भागों में भी कहीं-कहीं पाया जाता है. भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं. वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सुगंधित तेल का अंश भी बढ़ने लगता है. इसकी पूर्ण परिपक्वता में 60 से लेकर 80 वर्ष तक का समय लगता है. इसके लिए ढलवाँ जमीन, जल सोखने वाली उपजाऊ चिकनी मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है.

भारत में हीरे की खानें कहाँ है?

भारत में आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और तमिलनाडु के कोल्लूर तथा मध्य प्रदेश के पन्ना और बुंदर में हीरा खानें हैं. भारत के हीरे एक ज़माने में विश्व प्रसिद्ध थे. गोलकुंडा से 185 कैरेट का दरिया-ए नूर हीरा ईरान गया था. भारत के सबसे बड़े हीरे की बात करें तो नाम आता है ग्रेट मुगल का. गोलकुंडा की खान से 1650 में जब यह हीरा निकला तो इसका वजन 787 कैरेट था. कोहिनूर से करीब छह गुना भारी.

कहा जाता है कि कोहिनूर भी ग्रेट मुगल का ही एक अंश है. 1665 में फ्रांस के जवाहरात के व्यापारी ने इसे अपने समय का सबसे बड़ा रोजकट हीरा बताया था. यह हीरा आज कहां है किसी को पता नहीं. लंबे समय से गुमनाम भारतीय हीरों की सूची में आगरा डायमंड और अहमदाबाद डायमंड भी शामिल हैं. अहमदाबाद डायमंड को बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के राजा विक्रमजीत को हराकर हासिल किया था. तब 71 कैरेट के इस हीरे को दुनिया के 14 बेशकीमती हीरों में शुमार किया जाता था.

हल्की गुलाबी रंग की आभा वाले 32.2 कैरेट के आगरा डायमंड को हीरों की ग्रेडिंग करने वाले दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका ने वीएस-2 ग्रेड दिया है. द रीजेंट की कहानी भी कुछ ऐसी ही हैं. 1702 के आसपास यह हीरा गोलकुंडा की खान से निकला. तब इसका वजन 410 कैरेट था. मद्रास के तत्कालीन गवर्नर विलियम पिट के हाथों से होता हुआ द रीजेंट फ्रांसीसी क्रांति के बाद नेपोलियन के पास पहुंचा. नेपोलियन को यह हीरा इतना पसंद आया कि उसने इसे अपनी तलवार की मूठ में जड़वा दिया. अब 140 कैरेट का हो चुका यह हीरा पेरिस के लूव्र म्यूजियम में रखा गया है.

गुमनाम भारतीय हीरों की लिस्ट में अगला नाम है ब्रोलिटी ऑफ इंडिया. 90.8 कैरेट के ब्रोलिटी को कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है. 12वीं शताब्दी में फ्रांस की महारानी में इसे खरीदा. कई सालों तक गुमनाम रहने के बाद यह हीरा 1950 में सामने आया. जब न्यूयॉर्क के जूलर हेनरी विन्सटन ने इसे भारत के किसी राजा से खरीदा. आज यह हीरा यूरोप में कहीं है.

शादियों या पार्टियों के कार्ड में नीचे लिखा रहता है RSVP. इसका मतलब क्या है?

रेस्पांदे सी वु प्ले (Respondez Sil Vous Plait). इस फ्रेंच वाक्यांश में विनम्रता से पूछा गया है कृपया बताएं आ रहे हैं या नहीं.

विश्व की सबसे लम्बी कविता कौन सी है?

माना जाता है कि महाभारत दुनिया की सबसे लम्बी कविता है. इसमें एक लाख से ज्यादा श्लोक हैं और लगभग बीस लाख शब्द हैं. प्रसिद्ध ग्रीक महाकाव्य इलियाड और ओडिसी को एक साथ मिला लें तब भी महाभारत उनसे दस गुना बड़ा ग्रंथ साबित होगा.

फैट जीन क्या है?

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने ‘एफटीओ’ नामक विशेष कोशिका खोज निकाली है, जिसकी वजह से खासकर भारतीय मूल के लोगों में मोटापा, हृदयघात और मधुमेह जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं. इस खास जीन से यह भी जानकारी मिलेगी कि एक प्रकार की जीवनशैली के बावजूद कुछ लोगों का शरीर दुरुस्त रहता है, लेकिन कुछ मोटे हो जाते हैं. “जिनके शरीर में यह खास किस्म का जीन पाया जाता है, उन्हें अगर एक प्रकार का आहार दिया जाए, तो वह उन लोगों के मुकाबले अपना वजन बढ़ा हुआ महसूस करते है, जिनके शरीर में यह जीन नहीं होता है.”

मोटापे का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में चर्बी बढ़ने के लिए जीन जिम्मेदार है. वैज्ञानिकों का यह भी दावा है कि इस जीन को खोज लिया गया है, जो कोशिकाओं में चर्बी जमा होने के लिए जिम्मेदार हैं. खोज से अनेक बीमारियों के उपचार और छुटकारा पाने की संभावना जताई गई है. फिट-1 व फिट-2 (फैट इंड्यूसिंग ट्रांसक्रिप्ट 1-2) नामक जीन की पहचान की है. इन दोनों जीनों में 50 प्रतिशत तक समानता है. इस विषय पर ताजा जानकारी यहाँ मिल सकती है http://www.usatoday.com/story/news/health/2015/08/19/obesity-gene/32026927/

Thursday, December 10, 2015

गिरगिट रंग कैसे बदलता है?

केवल गिरगिट की बात ही नहीं है, तमाम तरह के प्राणियों को प्रकृति ने आत्मरक्षा में अपने रंग-रूप को बदलने की सामर्थ्य दी है. गिरगिट जिस परिवेश में रहते हैं उनका रंग उसी से मिलता जुलता होता है ताकि वे दूर से नज़र न आएं. यह उनकी प्रणय शैली भी है, अपने साथी को आकर्षित करने के लिए वे रंग बदलते हैं. उनकी ऊपरी त्वचा पारदर्शी होती है जिसके नीचे विशेष कोशिकाओं की परतें होती है जिन्हें क्रोमैटोफोर कहा जाता है. इनकी बाहरी परत में पीले और लाल सेलों की होती है. निचली छेद होते हैं, जिनसे गुज़रने वाली रोशनी नीले रंग की रचना करती है. ऊपरी रंगत पीली हो दोनों रंग मिलकर हरे हो जाते हैं. सबसे आखिरी परत मेलनोफोर से बनी होती है. इसमें मेलनिन नामक तत्व होता है. जब मेलनोफोर सेल सक्रिय होते हैं, तब गिरगिट नीले और पीले रंग के मिश्रण से हरा दिखाई देता है या नीले और लाल रंग का मिश्रण दिखाई देता है. जब गिरगिट गुस्से में होता है तो काले कण उभर आते हैं और गिरगिट गहरा भूरा  दिखाई देता है. तितलियों का भी रंग बदलता है, लेकिन वह हल्के से गहरे या फिर गहरे से हल्के रंगों में ही परिवर्तित होता है, जबकि गिरगिट के कई रंग होते हैं. इनके मस्तिष्क को जैसे ही खतरे का संदेश जाता है, इनका दिमाग उन कोशिकाओं को संकेत भेजता है और यह कोशिकाएं इसी के अनुरूप फैलने व सिकुड़ने लगती हैं और गिरगिट का रंग बदल जाता है.

ऑप्टिकल फाइबर क्या है? सूचना प्रौद्योगिकी में इसकी क्या भूमिका है?

ऑप्टिकल फाइबर इंसान के बाल जैसा महीन एक पारदर्शी फाइबर या धागा है, जो ग्लास(सिलिका) या प्लास्टिक से बनता है. इसका इस्तेमाल प्रकाश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना होता है. इसे वैवगाइड या लाइट पाइप कह सकते हैं. फाइबर-ऑप्टिक संचारण एक प्रणाली है जिसमें सूचनाओं की जानकारी एक स्थान से दूसरे स्थान तक ऑप्टिकल फाइबर के माध्यम से प्रकाश बिन्दुओं के रूप में भेजी जाती हैं. यानी ताँबे या किसी सुचालक धातु के मार्फत सूचना भेजने के बजाय प्रकाश के माध्यम से सूचना भेजना. इन दिनों यह तकनीक फाइबर ऑप्टिक संचार में काम आ रही है. इसके माध्यम से काफी दूरी तक काफी हाई बैंडविड्थ में जानकारी भेजी जा सकती है. इसमें एक तो छीजन या लॉसेज़ कम हैं दूसरे इलेक्ट्रॉमैग्नेटिक व्यवधान नहीं होते. सिद्धांततः यह तकनीक उन्नीसवीं सदी से प्रचलन में है, पर 1970 के दशक में इसे व्यावसायिक रूप से विकसित किया गया. इसके लाभ को देखते हुए विकसित दुनिया में कोर नेटवर्क में ताँबे या अन्य धातुओं के तारों की जगह काफी हद तक ऑप्टिकल फाइबर ने ले ली है. सन 2000 के बाद से फाइबर ऑप्टिक-संचार की कीमतों में काफी गिरावट आई है. इस वक्त इस तकनीक की पाँचवीं पीढ़ी का विकास हो रहा है. आधुनिक फाइबर ऑप्टिक संचार प्रणालियों में आमतौर फाइबर शामिल एक ऑप्टिकल ट्रांसमिटर होता है जो ऑप्टिकल सिगनल को कन्वर्ट कर ऑप्टिकल फाइबर को भेजता है.

जहाज कैसे तैरते हैं? 

पहले तैरने या उतराने का सिद्धांत समझ लें. आर्किमीडीज़ का सिद्धांत है कि कोई वस्तु जब पानी में डाली जाती है तब उसके द्वारा हटाए गए जल का भार उस वस्तु के भार के बराबर होता है. और हटाए गए पानी की ताकत उसे वापस ऊपर की ओर उछालती है. इसलिए लोहे का एक टुकड़ा जब पानी में डाला जाता है तब उसके द्वारा हटाए गए पानी की ऊपर को लगने वाली शक्ति को छोटा आकार मिलता है. यदि इसी लोहे के टुकड़े की प्लेट बना दी जाती तो उसका आकार बड़ा हो जाता और वह पानी के नीचे से आनी वाली ताकत का फायदा उठा सकती थी. यही नाव या जहाज के पानी पर उतराने का सिद्धांत है. पानी के ऊपर चलने के लिए या तो पतवार की ज़रूरत होती है अन्यथा किसी घूमने वाली चरखी की. जहाज के इंजन यह काम करते हैं.

होटलों की स्टार रेटिंग कैसे तय होती है?

दुनिया में होटलों की रेटिंग तय करने की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है. अलबत्ता सन 1958 में मोबिल ट्रैवल गाइड ने अपने ढंग से होटलों की रेटिंग शुरू की. इस गाइड को अब फोर्ब्स ट्रैवल गाइड कहते हैं. यात्रियों को होटल में प्राप्त सुविधाओं को बताने के लिए स्टार रेटिंग की व्यवस्था शुरू की गई थी. धीरे-धीरे दुनिया में होटल स्टार्स यूनियन बन गईं. जैसे यूरोपियन होटलस्टार्स यूनियन यूरोपियन यूनियन के 24 देशों की 39 यूनियनों की संस्था है. बहरहाल इन संगठनों ने पाँच स्टार तक होटलों की व्यवस्थाओं को परिभाषित किया है. कुछ होटल पाँच के बाद सुपर लक्ज़री जैसे विशेषण जोड़ लेते हैं. दुबई के होटल अल बुर्ज को दुनिया का पहला सेवन स्टार होटल कहने लगे हैं. इसके पहले मिलान, इटली में सेवन स्टार्स गैलेरिया ने खुद को दुनिया का पहला सेवन स्टार होटल घोषित कर दिया था. यह विवाद का विषय है.

हनीमून पर जाने की शुरूआत कैसे हुई? 

अंग्रेजी शब्दों की वैबसाइट वर्ल्डवाइड वर्ड्स (http://www.worldwidewords.org) के अनुसार हनीमून शब्द का पहली बार इस्तेमाल 16वीं सदी में रिचर्ड ह्यूलोट ने किया था. जैसा कि इसका आधुनिक अर्थ है विवाह के बाद कुछ समय का अवकाश जो नव दम्पति बिताते हैं. इसमें हनी का अर्थ मधुरता से और मून का बदलते समय, एक पखवाड़े और प्रेम के प्रतीक से भी है. कुछ लोगों का कहना है कि इसका मूल 4000 साल पुराने बेबीलोन में है, जहाँ विवाहित जोड़ा विवाह के बाद एक खास तरह का शर्बत पीता था, जिसमें शहद होता था. बहरहाल ऐसा लगता है कि 18 वीं सदी तक यह शब्द बहुत ज्यादा प्रचलन में नहीं था. अलबत्ता एक रोचक बात यह है कि यूरोपीय समाज ने इसे भारत से सीखा. अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने भारत में देखा कि विवाह के बाद लड़का और लड़की अपने सम्बन्धियों के घर जाकर मिलते हैं. इससे दोनों का परिचय अपने नए सम्बन्धियों से होता है. उस परम्परा में पर्यटन का भाव नहीं था. यूरोप में उसे पर्यटन का रूप मिला.
प्रभात खबर में प्रकाशित



Friday, December 4, 2015

तेनालीराम कौन थे?

तेनाली रामकृष्ण, तेनाली रामलिंगम या तेनाली राम तमिल, तेलुगु और कन्नड़ लोककथाओं का एक पात्र है. सोलहवीं सदी में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे. तेनालीराम उनके दरबार के कवि थे और वे अपनी समझ-बूझ और हास-परिहास के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे. विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ापर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली. तेनालीराम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती थी.

कुइज़ीन Cuisine का क्या मतलब होता है?
कुइज़ीन फ्रांसीसी शब्द है, जिसका अर्थ है खाना बनाने की कला. इसके लिए लैटिन शब्द है कोकरे. पर कुइज़ीन शब्द का इस्तेमाल किसी स्थान विशेष या किसी और तरह से विशेष भोजन के लिए किया जाता है. जैसे जापानी व्यंजन, बंगाली, दक्षिण भारतीय, गुजराती वगैरह. स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल भी इसमें महत्वपूर्ण है.

भारत सोने की चिड़िया कब था? अब क्यों नहीं है?
ईसा से 300 से कुछ ज्यादा साल पहले भारत में चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था. उनके शासन से लेकर उनके पौत्र सम्राट अशोक तक के समय को भारत का श्रेष्ठ समय कह सकते हैं. अपने समय में दुनिया के महानतम सम्राट हुए हैं. अशोक ने स्वतंत्रता, समता, न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया. उनके राज्य में ही भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अमर्त्य सेन के अनुसार अशोक के समय में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी. भारत की समृद्धि कमोबेश जारी रही और पंद्रहवीं शताब्दी मे विश्व की पूरी अर्थव्यवस्था का पाँचवाँ हिस्सा भारत मे था. देश में मौजूद 18 हजार टन से ज्यादा सोने का भंडार इस बात का सबूत है कि भारत आज भी सोने की चिड़िया है. पर अर्थव्यवस्था की ताकत के आधार पर अभी यह बात नहीं कही जा सकती.

दुनिया की सबसे महंगी करेंसी कौन सी है?
सबसे महंगी करेंसी कुवैत की दीनार है जिसका वर्तमान रेट 3.5 डॉलर के आसपास है. सबसे कम मूल्य की करेंसियों में ईरान की रियाल (प्रति डॉलर लगभग 25,000), सोमाली शिलिंग (22,000) और वियतनाम का डोंग (21,000) होगा. यह रेट बढ़ता-घटता रहता है.

विशेषाधिकार हनन नोटिस क्या है? क्या इसे कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है?
संसद के विशेषाधिकार हनन पर यह प्रस्ताव लाया जा सकता है. सामान्यतः संसद के नियमों को अदालतें विचार के लिए स्वीकार नहीं करतीं. पर यदि संविधान की व्याख्या का मसला हो तो सुप्रीम सकता कोर्ट विचार कर सकता है.
  
तेलंगाना इलाके को तेलंगाना क्यों कहते हैं ?
भारत के आंध्र प्रदेश राज्य का एक क्षेत्र है, जिसे एक नया राज्य बनाने का फैसला हुआ है. इस इलाके में मान्यता है कि इस इलाके में लिंग के रूप में शिव तीन पर्वतों पर प्रकट हुए. ये हैं कालेश्वरम, मल्लिकार्जुन और द्राक्षाराम. ये पर्वत इस इलाके की सीमा बनाते हैं और इसीलिए इसे त्रिलिंग देश कहा जाता है जो तेलंगाना हो गया है. तेलुगु शब्द की उत्पत्ति भी इसी त्रिलिंग से है. यह पराधीन भारत के हैदराबाद नामक राजवाडे के तेलुगु भाषी क्षेत्रों से मिलकर बना है. 'तेलंगाना' शब्द का अर्थ है- 'तेलुगु भाषियों की भूमि' . तेलुगु शब्द का मूल रूप संस्कृत में "त्रिलिंग" है. इसका तात्पर्य आंध्र प्रदेश के श्रीशैल के मल्लिकार्जुन लिंग, कालेश्वर और द्राक्षाराम के शिवलिंग से है. इन तीनों सीमाओं से घिरा देश त्रिलिंगदेश और यहाँ की भाषा त्रिलिंग (तेलुगु) कहलाई.

भारत से किन-किन लोगों को नोबल पुरस्कार मिले हैं?
नोबेल सम्मान पाने वाले भारत से सम्बद्ध व्यक्तियों के नाम इस प्रकार हैः-
1902 रोनाल्ड रॉस-चिकित्सा-भारत में जन्मे विदेशी
1907 रुडयार्ड किपलिंग-साहित्य-भारत में जन्मे विदेशी
1913 रवीन्द्रनाथ ठाकुर-साहित्य    -भारतीय नागरिक
1930 सीवी रामन-भौतिक विज्ञान-भारतीय नागरिक
1968 डॉ हरगोविन्द खुराना-चिकित्सा-भारत में जन्मे अमेरिकी नागरिक
1979 मदर टेरेसा-शांति पुरस्कार-विदेश में जन्मीं, भारत में निवास
1983 सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर-भौतिक विज्ञान-भारत में जन्मे अमेरिकी नागरिक
1989-दलाई लामा-शांति-भारत में निवासी विदेशी
1998 अमर्त्य सेन-अर्थशास्त्र-भारतीय नागरिक
2001 वीएस नाइपॉल-साहित्य-भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक
2009 वेंकट रामन रामकृष्णन-रसायन शास्त्र-भारत में जन्मे अमेरिकी नागरिक
2014 कैलाश सत्यार्थी-शांति-भारतीय नागरिक

रामैया वस्तावैया का क्या मतलब होता है?
रामैया वस्तावैया का मतलब है राम या रामैया, क्या तुम आ रहे हो? तेलुगु के इन शब्दों का इस्तेमाल शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने किया और श्री 420 के मार्फत एक यादगार गीत बना दिया. कहते हैं कि कभी शैलेन्द्र ने अपनी हैदराबाद यात्रा के दौरान ये पंक्तियाँ सुनी थीं. उन्हें ये भा गईं और मौका लगने पर इन्हें इस गीत में पिरो दिया.

धरती पर सबसे लंबी उम्र और सबसे छोटी उम्र वाले जीव कौन हैं?
जापानी मछली कोई 250 साल तक, विशाल कछुआ (जाइंट टर्टल) पौने दो सौ से दो सौ साल तक, ह्वेल मछली दो सौ साल तक जीती है. मे फ्लाई नाम की मक्खी की उम्र 24 घंटे होती है. इसी तरह जल में रहने वाले एक नन्हें प्राणी गैस्ट्रोटिच की उम्र होती है तीन दिन. 
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Friday, November 27, 2015

मैग्सेसे पुरस्कार किसके नाम पर दिया जाता है?

रैमन मैग्सेसे पुरस्कार की स्थापना 1957 में हुई. इसका नामकरण फिलिपींस के राष्ट्रपति रैमन मैग्सेसे के नाम पर हुआ, जिनकी 1957 में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. इनका नाम स्थानीय भाषा में मैगसायसाय है, जो हिन्दी में मैग्सेसे प्रचलित है. यह पुरस्कार प्रतिवर्ष मैग्सेसे जयंती पर 31 अगस्त को लोक सेवा, सामुदायिक सेवा, पत्रकारिता, साहित्य तथा सृजनात्मक कला और अंतर्राष्ट्रीय सूझबूझ के लिए प्रदान किया जाता है. यह पुरस्कार ग़ैर एशियायी संगठनों, संस्थानों को भी एशिया के हित में कार्य करने के लिए दिया जा सकता है. भारत के विनोबा भावे, मदर टेरेसा, सत्यजित रॉय, वर्गीज कुरियन, एमएस सुब्बुलक्ष्मी, एमएस स्वामीनाथन, चंडी प्रसाद भट्ट, बाबा आम्टे, अरुण शौरी, टीएन शेषन, महाश्वेता देवी, अरविन्द केजरीवाल, किरन बेदी, जेएम लिंग्दोह जैसे अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों को मिल चुका है. 

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कृष्ण गुरु कौन थे?

कृष्ण ने मथुरा में गर्गिमुनी से गायत्री मन्त्र एवं संदीपन मुनि से वैदिक कला और विज्ञान सीखा. उनके तेजस्वी गुरु संदीपन ऋषि थे. श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने के पश्चात मथुरा का समस्त राज्य अपने नाना उग्रसेन को सौंप दिया था. इसके बाद वासुदेव और देवकी ने कृष्ण को यज्ञोपवीत संस्कार के लिए संदीपन ऋषि के आश्रम में भेज दिया, जहाँ उन्होंने चौंसठ दिनों में चौंसठ कलाएँ सीखीं. संदीपन ऋषि के आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी, जो बाद में अटूट मित्रता बन गई. संदीपन ऋषि द्वारा कृष्ण और बलराम ने अपनी शिक्षाएँ पूर्ण की थीं. आश्रम में कृष्ण-बलराम और सुदामा ने एक साथ वेद-पुराण का अध्ययन प्राप्त किया था. दीक्षा के उपरांत कृष्ण ने गुरुमाता को गुरु दक्षिणा देने की बात कही. इस पर गुरुमाता ने कृष्ण को अद्वितीय मान कर गुरु दक्षिणा में उनका पुत्र वापस माँगा, जो प्रभास क्षेत्र में जल में डूबकर मर गया था. गुरुमाता की आज्ञा का पालन करते हुए कृष्ण ने समुद्र में मौजूद शंखासुर नामक एक राक्षस का पेट चीरकर एक शंख निकाला, जिसे "पांचजन्य" कहा जाता है. इसके बाद वे यमराज के पास गए और संदीपन ऋषि का पुत्र वापस लाकर गुरुमाता को सौंप दिया.

जेट लैग क्या होता है?
जेट लैग एक मनो-शारीरिक दशा है, जो शरीर के सर्केडियन रिद्म में बदलाव आने के कारण पैदा होती है. इसे सर्केडियन रिद्म स्लीप डिसॉर्डर भी कहते हैं. इसका कारण लम्बी दूरी की हवाई यात्रा खासतौर से पूर्व से पश्चिम या पश्चिम से पूर्व एक टाइम ज़ोन से दूसरे टाइम ज़ोन की यात्रा होती है. अक्सर शुरुआत में नाइट शिफ्ट पर काम करने आए लोगों के साथ भी ऐसा होता है. आपका सामान्य जीवन एक खास समय के साथ जुड़ा होता है. जब उसमें मूलभूत बदलाव होता है तो शरीर कुछ समय के लिए सामंजस्य नहीं बैठा पाता. अक्सर दो-एक दिन में स्थिति सामान्य हो जाती है. इसमें सिर दर्द, चक्कर आना, उनींदा रहना, थकान जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाती है.

स्थगन प्रस्ताव क्या होता है? संसद क्यों, और एक दिन में कितनी बार स्थगित हो सकती है?

हमारी संसद के दोनों सदनों के नियमों में सार्वजनिक महत्त्व के मामले बिना देरी किए उठाने की कई व्यवस्थाएं हैं, इनमें कार्य स्थगन प्रस्ताव भी है. इसके द्वारा लोक सभा के नियमित काम-काज को रोककर तत्काल महत्त्वपूर्ण मामले पर चर्चा कराई जा सकती है. इसके अलावा कई और तरीके हैं जैसे कि ध्यानाकर्षण, आपातकालीन चर्चाएं, विशेष उल्लेख, प्रस्‍ताव (मोशन), संकल्प, अविश्वास प्रस्‍ताव, निंदा प्रस्‍ताव वगैरह. अगला सवाल है कि दिन में कितनी बार सदन स्थगित हो सकता है? यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

संसद की कार्यवाही में किसी भाषण के समय कुछ चीजें रिकॉर्ड से बाहर क्यों कर दी जाती है?

यह संसद का अधिकार है कि वह कुछ खास शब्दों, अभिव्यक्तियों, विचारों या घटनाओं को आधिकारिक दस्तावेजों में नहीं रखना चाहती तो उसे रिकार्ड से बाहर कर दे. इस अधिकार का इस्तेमाल सामान्यतः पीठासीन अधिकारी के माध्यम से होता है.

चेक बाउंस होने पर ज़ुर्माना क्यों लगता है? क्या यह फाइन हर बार एक सा रहता है?

आपका आशय बैंक के फाइन से है. यह शुल्क तो बैंक इसलिए लेता है, क्योंकि वह उसे क्लियरिंग तक भेजता है और उसपर धनराशि नहीं मिलता. यह राशि अलग-अलग बैंक अलग-अलग लेते हैं. यों बार-बार यह गलती होने पर बैंक आपकी चेकबुक सुविधा वापस ले सकते हैं और खाता बंद भी कर सकते हैं. चेक बाउंस होने के अनेक कारण हो सकते हैं. मसलन खाते में पैसा नहीं है, तारीख गलत लिख दी गई है, खातेदार के हस्ताक्षर नहीं मिलते वगैरह. अलबत्ता जिसने यह चेक दिया है उसकी जिम्मेदारी है कि भुगतान करे. यदि वह चेक में बताई गई राशि का भुगतान नहीं करता तो उसके खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत मुकदमा दायर किया जा सकता है जिसपर उसे सजा या जुर्माना कुछ भी हो सकता है. 

Thursday, November 19, 2015

किसी दवा की एक्सपायरी डेट कैसे तय होती है?

किसी भी दवा की समय सीमा एक वैज्ञानिक पद्धति से तय की जाती है. इन दवाइयों को सामान्य से कठिन परिस्थितियों में रखा जाता है जैसे 75 आरएच से अधिक आर्द्रता या 40 डिग्री से अधिक तापमान. फिर हर महीने या हर हफ़्ते उनकी प्रभावशीलता की जांच की जाती है. इसी आधार पर यह तय किया जाता है कि अमुक दवा की समय सीमा डेढ़ साल हो, दो साल या तीन साल. जब दवा बाज़ार में आ जाती है तो फिर उसका अध्ययन किया जाता है और उसकी प्रभावशीलता के अनुसार ही उसकी समय सीमा बढ़ाई जाती है.
भारी पानी (हैवी वॉटर) क्या होता है?
भारी पानी भी पानी है, पर खास तरह का. पानी की रासायनिक संरचना हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु के मिलने से होती है. इसे कहते हैं एच2ओ. पर भारी पानी को कहते हैं डी2ओ. इसमें डी है हाइड्रोजन का आइसोटोप (समस्थानिक) ड्यूडीरियम. हाइड्रोजन के तीन प्रकार के आइसोटोप होते हैं. एक, प्रोटीयम, जो सामान्य पानी में होता है. इसे लाइट हाइड्रोजन कहते हैं. दूसरा है ड्यूटीरियम, जिसे भारी हाइड्रोजन कहते हैं और तीसरा है टाइरियम. भारी पानी को ड्यूटीरियम ऑक्साइड के नाम से भी जाना जाता है. इसी तरह ऑक्सीजन के भी तीन प्रकार के समस्थानिक या आइसोटोप होते हैं. इनके मिलने से सोलह प्रकार के पानी बनते हैं. सामान्यत: हम जिस पानी का इस्तेमाल करते हैं, उसमें भी भारी पानी हो सकता है, पर उसकी मात्रा बहुत कम होती है. एक टन में तकरीबन डेढ़ सौ ग्राम. आम पानी और भारी पानी के भौतिक और रासायनिक गुणधर्मों में काफी समानता है, लेकिन नाभिकीय गुणधर्मों में काफी फर्क है. भारी पानी के गुणधर्म इसे नाभिकीय रिएक्टर में मंदक यानी कूलेंट के रूप में उपयोगी बनाते हैं. कूलेंट के रूप में हल्के पानी के अलावा बेरीलियम और भारी पानी का इस्तेमाल होता है. भारी पानी इनमें सबसे बेहतर है.

ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) की ओपनिंग धुन किस संगीतकार ने बनाई और कब?
इस बारे में कई तरह की बातें हैं. कुछ लोगों की मान्यता है कि इसे ठाकुर बलवंत सिंह ने बनाया. कुछ मानते हैं कि पं रविशंकर ने इसकी रचना की और कुछ लोग वॉयलिन वादक वीजी जोग को इसका रचेता मानते हैं. सम्भव है इसमें इन सबका योगदान हो, पर इसकी रचना का श्रेय चेकोस्लोवाकिया के बोहीमिया इलाके के संगीतकार वॉल्टर कॉफमैन को जाता है. इसकी रचना तीस के दशक में हुई होगी. कम से कम 1936 से यह अस्तित्व में है. वॉल्टर कॉफमैन उस वक्त मुम्बई में ऑल इंडिया रेडियो के पश्चिमी संगीत विभाग में कम्पोज़र का काम कर रहे थे. इस धुन में तानपूरा, वायोला और वॉयलिन का इस्तेमाल हुआ है. वॉल्टर कॉफमैन को यूरोप की राजनीतिक स्थितियों के कारण घर से बाहर आना पड़ा. वे अंतत: अमेरिका में बसे, पर भारत में भी रहे और यहाँ के संगीत का उन्होंने अध्ययन किया. कहा जाता है कि उनके एक सोनाटा यानी बंदिश या रचना में यह धुन भी थी. कॉफमैन ने इसमें कुछ बदलाव भी किया. इस रचना में वॉयलिन ज़ुबिन मेहता के पिता मेहली मेहता ने बजाया है. कुछ लोगों का कहना है कि यह राग शिवरंजिनी में निबद्ध है.

पुनर्विचार याचिका क्या है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 137 और 145 के तहत अपीलीय अदालतों यानी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के बारे में कोई पक्ष पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है. यह याचिका अदालत के निर्णय के बाद तीस दिन के भीतर दाखिल की जानी चाहिए. पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद भी वह पक्ष उपचार याचिका या क्यूरेटिव पैटीशन दाखिल कर सकता है.

भारतीय शिल्प की नागर शैली क्या है?
हिन्दू शिल्प शास्त्र में कई तरह के शिखरों का विवरण मिलता है. इनमें नागर, द्रविड़ और वेसर प्रमुख हैं. नागर शैली आर्यावर्त की प्रतिनिधि शैली है जिसका प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक देखा जा सकता है. वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों की पहचान आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना है.

क्या हम अदालत में अपने मुकदमे की जिरह खुद कर सकते हैं?
हाँ आप जिरह कर सकते हैं. वकील की व्यवस्था आप की सहायता के लिए है. सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था है कि आप केवल अपने मामले की जिरह कर सकते हैं, किसी दूसरे की नहीं. उसके लिए वकील करना ही होगा. हाल में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने मामलों को अदालत के सामने रखने के लिए कुछ जरूरी निर्देश भी जारी किए हैं. यों जटिल मामलों में आपको वकील की जरूरत होगी. साथ ही आपको कानून और अदालती प्रक्रिया की समझ भी होनी चाहिए.

जेंडर स्टडीज़ क्या होती है?
जेंडर स्टडीज़ का सामान्य अर्थ लैंगिक मसलों का अध्ययन है. इसमें महिला और पुरुष दोनों का अध्ययन शामिल है, पर व्यावहारिक रूप से यह नारी विषयक अध्ययन है. इसमें कानून, राजनीति, साहित्य, समाज, संस्कृति, मनोविज्ञान, पारिवार जैसे तमाम मसले शामिल हैं. यह मल्टी डिसिप्लिनरी अध्ययन है.
प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Tuesday, November 17, 2015

जाड़ों में स्वेटर या गर्म कपड़े पहनने पर हमें ठंड क्यों नहीं लगती है ?

ऊनी कपड़ों में गर्मी नहीं होती, बल्कि वे हमें सर्दी लगने से रोकते हैं। ऊनी या मोटे कपड़े तापमान के कुचालक होते हैं। यानी बाहर की सर्दी से वे ठंडे नहीं होते। हमारे शरीर की गर्मी हमें गर्म रखती है। यही बात गर्मी पर भी लागू होती है। आपने देखा होगा कि रेगिस्तानी इलाकों के लोग मोटे कपड़े पहनते हैं। इसका कारण यह है कि मोटे कपड़े गर्मी को भीतर आने नहीं देते।

वायुयान से पक्षियों के टकराने के कारण भयंकर दुर्घटना का खतरा होता है। जमीन से कितनी ऊँचाई तक पक्षी मिलते हैं?

वायुसेना के जो विमान दुर्घटना के शिकार होते हैं, उनमें से 9 फीसदी दुर्घटनाओं का कारण पक्षियों से टकराना है। भारत में नागरिक विमानों से भी पक्षियों के टकराने की सालाना औसतन 200 घटनाएं होती हैं। सभी दुर्घटनाओं में विमान गिरते नहीं हैं। अक्सर मामूली नुकसान होता है। मानसून के मौसम में पक्षियों से टकराने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। बड़े विमानों को तो छोटे पक्षियों से सिर्फ कुछ नुकसान होता है लेकिन जिस तेज रफ्तार से लड़ाकू विमान उड़ान भरते हैं। उससे टकराने वाले छोटे पक्षी का आघात काफी जबर्दस्त होता है। आमतौर पर पक्षियों से टकराने की घटनाएं टेकऑफ और लैंडिंग के समय होती है क्योंकि ऊंचाई हासिल करने के बाद विमान जिस ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं वहां पक्षी नहीं होते। इसलिए हवाई अड्डे के चार-पाँच किलोमीटर के दायरे में खतरा ज्यादा होता है, खासतौर से ज़मीन से एक हज़ार फुट की ऊँचाई तक। वायुसेना ने पक्षियों की समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं जिनमें एवियन रेडार लगाना, झाडियों को साफ करना, माइक्रो लाइट विमानों की मदद से पक्षियों पर निगरानी करना आदि शामिल हैं। एवियन रेडार के जरिए पक्षियों के झुंड पर तीन किमी. दूर से नजर रखी जा सकती है। यह वही दूरी है जो उड़ान भरते और उतरते विमानों के लिए काफी जोखिम भरी होती है। एवियन रेडार की सूचना के आधार पर पायलट को पूर्व सूचना दे कर सतर्क किया जा सकता है। अब हवाई अड्डों पर पक्षियों की आवाजें निकालने वाली मशीनें भी लगाई जा रही हैं। पक्षियों की आवाजों के अध्ययन से पता लगा है कि वे खतरे के मौके पर खास तरह का आवाज़ें निकालते हैं। उन आवाज़ों को हवा में छोड़ने पर पक्षी उस दिशा से विपरीत दिशा में उड़ना शुरू कर देते हैं। 




एक्साइज ड्यूटी क्या है? और यह किन-किन वस्तुओं पर लागू होती है? क्या यह कारीगर और मजदूरों पर लागू होती है?

एक्साइज़ ड्यूटी परोक्ष टैक्स है जो किसी उत्पाद को बनाने वाला सरकार को देता है। अंततः यह टैक्स माल को खरीदने वाले को देना होता है। दुनिया भर के देशों में यह टैक्स लगता है। कारीगरों और मजदूरों पर यह लागू नहीं होता। इसे उत्पाद शुल्क भी कहते हैं। किसी वस्तु की कीमत बढ़ जाने का एक कारण एक्साइज ड्यूटी बढ़ना भी हो सकता है।


डेंगू शब्द कहाँ से आया?
हालांकि डेंगू शब्द का इस्तेमाल काफी होने लगा है, पर इस शब्द का सही उच्चारण डेंगी है। यह स्पष्ट नहीं है कि शब्द कहां से आया। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द स्वाहीली भाषा के वाक्यांश का-डिंगा पेपो से आया है। यह वाक्यांश बुरी आत्माओं से होने वाली बीमारी के बारे में बताता है। माना जाता है कि स्वाहीली शब्द डिंगा स्पेनी के शब्द डेंगी से बना है। इस शब्द का अर्थ है "सावधान"। वह शब्द एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने के लिए उपयोग किया गया हो सकता है जो डेंगू बुखार के हड्डी के दर्द से पीड़ित हो; वह दर्द उस व्यक्ति को सावधानी के साथ चलने पर मजबूर करता होगा। यह भी संभव है कि स्पेनी शब्द स्वाहीली भाषा से आया हो। कुछ का मानना है कि "डेंगू" नाम वेस्ट इंडीज़ से आया है। वेस्ट इंडीज़ में, डेंगू से पीड़ित लोग डैंडी की तरह तनकर खड़े होने वाले और चलने वाले कहे जाते थे और इसी कारण से बीमारी को भी "डैंडी फीवर" कहा जाता था।


राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Monday, November 9, 2015

हरित क्रांति क्या है?

हरित क्रांति शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल युनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएड) के पूर्व डायरेक्टर विलियम गॉड ने सन 1968 में किया. पर इसकी अवधारणा यूरोप की औद्योगिक क्रांति के बाद खेती-बाड़ी के काम में विज्ञान और तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ी है. बीसवीं सदी में दूसरे विश्व युद्ध के पहले ही अन्न उत्पादन की और दुनिया का ध्यान गया था. अलबत्ता दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब विजयी अमेरिकी सेना जापान पहुंची तो उसके साथ कृषि अनुसंधान सेवा के सैसिल सैल्मन भी थे. उस समय सबका ध्यान इस बात पर केंद्रित था कि जापान का पुनर्निर्माण कैसे हो. सैल्मन का ध्यान खेती पर था. उन्हें नोरिन-10 नाम की गेंहू की एक क़िस्म मिली जिसका पौधा कम ऊँचाई का होता था और दाना काफ़ी बड़ा होता था. सैल्मन ने इसे और शोध के लिए अमेरिका भेजा. तेरह साल के प्रयोगों के बाद 1959 में गेन्स नाम की क़िस्म तैयार हुई. अमेरिकी कृषि विज्ञानी नॉरमन बोरलॉग ने गेहूँ कि इस किस्म का मैक्सिको की सबसे अच्छी क़िस्म के साथ संकरण किया और एक नई क़िस्म निकाली.

उधर साठ के दशक में भारत में अनाज की उपज बढ़ाने की सख्त ज़रूरत थी. भारत को बोरलॉग और गेहूं की नोरिन क़िस्म का पता चला. भारत में आईआर-8 नाम का बीज लाया गया जिसे इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने विकसित किया था. पूसा के एक छोटे से खेत में इसे बोया गया और उसके अभूतपूर्व परिणाम निकले. 1965 में भारत के कृषि मंत्री थे सी सुब्रमण्यम. उन्होंने गेंहू की नई क़िस्म के 18 हज़ार टन बीज आयात किए, कृषि क्षेत्र में ज़रूरी सुधार लागू किए, कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों को जानकारी उपलब्ध कराई, सिंचाई के लिए नहरें बनवाईं और कुंए खुदवाए, किसानों को दामों की गारंटी दी और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम बनवाए. देखते ही देखते भारत अपनी ज़रूरत से ज़्यादा अनाज पैदा करने लगा. बहरहाल नॉरमन बोरलॉग हरित क्रांति के प्रवर्तक माने जाते हैं लेकिन भारत में हरित क्रांति लाने का श्रेय सी सुब्रमण्यम को जाता है.

दिल्ली राज्य कब बना और उसके पहले मुख्यमंत्री कौन थे?

दिल्ली की स्थिति देश में सबसे अलग है. केन्द्र शासित क्षेत्र होते हुए भी इसकी विधानसभा है और इसके शासन प्रमुख मुख्यमंत्री होते हैं. दिल्ली में सबसे पहले विधानसभा 17 मार्च 1952 को बनी थी. उस समय यहाँ के पहले मुख्यमंत्री थे चौधरी ब्रह्म प्रकाश. राज्यों के पुनर्गठन के बाद 1956 में इसे केन्द्र शासित क्षेत्र बना दिया और विधानसभा खत्म हो गई. इसके बाद 1991 में संविधान के 69 वें संशोधन के बाद 1993 में यहाँ विधानसभा की पुनर्स्थापना हुई. दिल्ली को नेशनल कैपिटल टैरीटरी बनाया गया. सन 1991 में भारतीय संसद में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम पास हुआ जिसके अधीन दिल्ली को राज्य का दर्जा मिला. केवल क़ानून और व्यवस्था केंद्र सरकार के हाथों में रही. यह अधिनियम 1993 में लागू हुआ और विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी विजयी रही और पहले मुख्यमंत्री बने मदन लाल खुराना.

हमें छींक क्यों आती है.

छींक आमतौर पर तब आती है जब हमारी नाक के अंदर की झिल्ली, किसी बाहरी पदार्थ के घुस जाने से खुजलाती है. नाक से तुरंत हमारे मस्तिष्क को संदेश पहुंचता है और वह शरीर की मांसपेशियों को आदेश देता है कि इस पदार्थ को बाहर निकालें. जानते हैं छींक जैसी मामूली सी क्रिया में कितनी मांसपेशियां काम करती हैं....पेट, छाती, डायफ्राम, वाकतंतु, गले के पीछे और यहां तक कि आंखों की भी. ये सब मिलकर काम करते हैं और बाहरी पदार्थ निकाल दिया जाता है. कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो कई छींके आती हैं. हाँ जब हमें जुकाम होता है तब छींकें इसलिए आती हैं क्योंकि जुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती है.

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों में सीधे बहस होती है. भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?
भारत और अमेरिका दो भिन्न प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देश हैं. वहाँ राष्ट्रपति पद का चुनाव सीधे होता है. देश की दो मुख्य पार्टियों के प्रत्याशियों का चुनाव भी वोटर सीधे करते हैं. वहाँ हर स्तर पर सीधे बहस सम्भव है क्योंकि अक्सर दो प्रत्याशियों के बीच सीधे मुकाबला होता है. हमारे देश में संसद सदस्यों का सीधे चुनाव होता है. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद का चुनाव सीधे जनता नहीं करती. पर यदि देश की प्रमुख पार्टियाँ अपने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित भी कर दें तो उसमें भी दिक्कत है. पार्टियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि दो व्यक्तियों के बीच बहस नहीं हो सकती.

फॉरेस्ट हिल नामक स्टेडियम किस खेल से सम्बंधित है?
फॉरेस्ट हिल न्यूयॉर्क सिटी के क्वींस बोरो का इलाका है. वहाँ है फॉरेस्ट हिल टेनिस स्टेडियम. विश्व प्रसिद्ध वेस्टसाइड टेनिस क्लब के पास अनेक स्टेडियम हैं उनमें यह भी एक है. सन 1923 में बना यह स्टेडियम कुछ साल पहले तक खस्ताहाल हो गया था. सन 1975 तक यहाँ अमेरिकी ओपन टेनिस प्रतियोगिता होती थी. हाल में इस स्टेडियम का जीर्णोद्धार किया गया है और अब यहाँ संगीत कार्यक्रम होने लगे हैं.
  

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Monday, November 2, 2015

फिटकरी भी क्या नमक की तरह समंदर से प्राप्त होती है?

फिटकरी एक प्रकार का खनिज है जो प्राकृतिक रूप में पत्थर की शक्ल में मिलता है। इस पत्थर को एल्युनाइट कहते हैं। इससे परिष्कृत फिटकरी तैयार की जाती है। नमक की तरह है, पर यह सेंधा नमक की तरह चट्टानों से मिलती है। यह एक रंगहीन क्रिस्टलीय पदार्थ है। इसका रासायनिक नाम है पोटेशियम एल्युमिनियम सल्फेट। संसार को इसका ज्ञान तकरीबन पाँच सौ से ज्यादा वर्षों से है। इसे एलम भी कहते हैं। पोटाश एलम का इस्तेमाल रक्त में थक्का बनाने के लिए किया जाता है। इसीलिए दाढ़ी बनाने के बाद इसे चेहरे पर रगड़ते हैं ताकि छिले-कटे भाग ठीक हो जाएं। इसके कई तरह के औषधीय उपयोग हैं। 

आए दिन ‘ग्रीन टी’ के बारे में पढ़ने में आता है। ग्रीन टी क्या है?

काली चाय और हरी चाय एक ही पौधे की उपज हैं। दोनों ही कैमेलिया साइनेंसिस प्लांट से हासिल होती हैं। हम जिस चाय को आमतौर पर पीते हैं वह प्रोसेस्ड सीटीसी चाय है, जिसका मतलब है कट, टीर एंड कर्ल। इसमें चाय की पत्तियों को तोड़कर मशीन में डालकर सुखाया जाता है। इसे छलनियों की मदद से छानकर अलग-अलग साइज़ में एकत्र कर लिया जाता है, जिसके पैकेट बनाए जाते हैं। चाय की पत्ती को हलका सा क्रश करने और हवा में सूखने के लिए छोड़ने के कारण उनमें ऑक्सीकरण के कारण काला रंग आ जाता है जैसा सेबों को काटने के बाद हो जाता है। ग्रीन टी को इस ऑक्सीकरण से बचाने के लिए एक तो इसे कुचला नहीं जाता बल्कि साबुत पत्ती को हल्की भाप दी जाती है जिससे इनमें मौज़ूद वे एंजाइम खत्म हो जाते हैं, जिनके कारण पत्ती काली होती है। इसके बाद इन पत्तियों को सुखा लिया जाता है, जिससे वे हरे रंग की रह जाती है। काली चाय में कैफीन होती है, हरी चाय में वह नहीं होती। इन दो किस्मों के अलावा एक ऊलांग और एक सफेद चाय भी होती है। यों तो हर प्रकार की चाय शरीर के लिए लाभकर है, पर ग्रीन टी हृदय, दिमाग और पूरे शरीर के लिए लाभकर है। खासतौर से कैंसर को रोकती है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट होते हैं जो शरीर के क्षय को रोकते हैं, कोलेस्ट्रॉल कम करती है और शरीर के वज़न को संतुलित रखती है। इसमें फ्लुओराइड हड्डियों को स्वस्थ रखता है। हरी चाय आसानी से उपलब्ध है।

दूध की अपेक्षा दही खाना अधिक स्वास्थ्यवर्धक कहा जाता है। ऐसा क्यों?
दूध और दही दोनों कैल्शियम के प्रमुख स्रोत हैं। कैल्शियम दांतों और हड्डियों के लिए खासतौर से ज़रूरी है। दही में दूध के मुकाबले कई गुना ज्यादा कैल्शियम होता है। दूध में लैक्टोबैसीलियस होते हैं जो दही जमाते हैं और कई गुना ज्यादा हो जाते हैं। इससे दही में पाचन की शक्ति बढ़ जाती है। दही में प्रोटीन, लैक्टोज़, आयरन और फॉस्फोरस पाया जाता है, जो दूध की तुलना में ज्यादा होता है। इसमें विटैमिन बी6 और बी 12 और प्रोटीन ज्यादा होता है। दही बनने पर दूध की शर्करा एसिड का रूप ले लेती है। इससे भोजन को पचाने में मदद मिलती है। त्वचा को कोमल और स्वस्थ बनाने में भी दही का उपयोग बेहतर है। कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिहाज से भी दही बेहतर है।

रॉकेट पश्चिम से पूरब की ओर ही क्यों छोड़ा जाता है ? 
राकेश जायसवाल, रायपुर धरती पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती है। जब अंतरिक्ष में भेजने के लिए रॉकेट को पूर्व की ओर भेजते हैं तब उसके वेग में धरती के घूमने का वेग भी शामिल हो जाता है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और वह आसानी से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को पार कर लेता है। 
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

Saturday, October 31, 2015

जीत होने पर दो उंगलियाँ ऊँची क्यों करते है?

हाथ की मध्यमा और तरजनी उंगलियों से बनने वाला अंग्रेजी का ‘वी’ विक्ट्री साइन माना जाता है. यानी विजय. पर इसका मतलब केवल विजय ही नहीं सफलता और शांति भी है. अंतरराष्ट्रीय सद्भाव के आंदोलन काउंटर कल्चर ने सन 1960 में इसे शांति के चिह्न के रूप में स्वीकार किया था. हालांकि इसका कोई नियम नहीं है, पर प्रायः हथेली को बाहर की ओर करके जब यह चिह्न बनाया जाता है तब विजय का सकारात्मक और शांतिपूर्ण अर्थ होता है. जब हथेली को भीतर की ओर करके इस निशान को बनाते हैं तब दम्भ और किसी को पराजित करने का भाव माना जाता है.
एक्यूपंक्चर क्या है?कैसे शुरू हुआ?

दर्द से राहत दिलाने या इलाज के लिए शरीर के विभिन्न बिंदुओं में सुई चुभाने और दबाव डालने की प्रक्रिया है एक्यूपंक्चर. दर्द से राहत दिलाने, सर्जरी के दौरान बेहोशी लाने और चिकित्सा प्रयोजनों के लिए शरीर के विशिष्ट क्षेत्रों की परिधीय नसों में सुई छेदने की यह कला प्राचीन चीन में विकसित हुई है. एक्यूपंक्चर की प्रारंभिक लिखित जानकारी ई.पू. दूसरी सदी के चीनी ग्रन्थ शिजी में मिलती है. यह 20वीं सदी के अंत में काफी लोकप्रिय हुआ है. परंपरागत चिकित्सा-शास्त्र के शोधकर्ताओं और आधुनिक वैज्ञानिकों के बीच इसे लेकर सहमति नहीं है. वैकल्पिक चिकित्सा ग्रंथों का कहना है कि एक्यूपंक्चर तकनीक नर्व्स स्नायविक दशाओं के उपचार और दर्द निवारण में प्रभावी हो सकती है. इस पद्धति का मूल विचार यह है कि शारीरिक क्रियाएं एक ऊर्जा द्वारा नियंत्रित होती है, जिसे छी (Qi) कहते हैं. यह पूरे शरीर में प्रवाहित होती है. इसके प्रवाह में बाधा पड़ने पर ही रोग पैदा होते हैं. एक्यूपंक्चर पद्धति त्वचा के नीचे के कुछ बिन्दुओं को सुई से छेद कर छी को प्रवाहित करने में मदद करती है. शास्त्रीय ग्रंथों में शरीर में बारह मुख्य और आठ अतिरिक्त एक्यूपंक्चर बिन्दु बताए गए हैं.

सैटेलाइट फ़ोन क्या होता है और कैसे काम करता है?

सैटेलाइट फ़ोन पृथ्वी की कक्षा में स्थित सैटेलाइटों के ज़रिए काम करता है इसलिए आप चाहे हिमालय पर हों, अंटार्कटिका में या दुनिया के किसी भी कोने में वह हर जगह काम करता है. ऐसे कोई 24 उपग्रह हैं जो पृथ्वी के हर क्षेत्र से जुड़े हैं. अभी तकनीक इतनी विकसित नहीं हो पाई है कि घर के भीतर से आप सैटेलाइट फ़ोन पर बात कर सकें. इसके लिए आपको खुले स्थान में आना पड़ता है और एक डिश की सहायता से उपग्रह का सिग्नल लेना पड़ता है. जैसे ही सिग्नल मिल जाए आप दुनिया के किसी कोने से कहीं भी बात कर सकते हैं.

पेंग्विन किस वर्ग का जीव है?

पेंग्विन एक प्रकार का पक्षी है जो उड़ नहीं पाता, पर काफी समय पानी के अंदर बिता सकता है. इनकी 17 प्रजातियाँ मिलती हैं. पेंग्विन के नाम पर हमें लगता है कि वे सिर्फ अंटार्कटिका के बर्फीले इलाकों में ही मिलते होंगे. ऐसा नहीं है. वे न्यूजीलैंड-ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में भी मिलते हैं.

एक गिलहरी की उम्र कितनी होती है?

गिलहरी की उम्र ज्यादा से ज्यादा छह साल होती है, पर शहर की गिलहरियाँ अक्सर इसके पहले ही मर जाती हैं. मोटर गाड़ियों या दूसरी दुर्घटनाओं में वे जल्दी फंस जाती हैं.


Thursday, October 29, 2015

‘वंस इन अ ब्लू मून’ मुहावरे का मतलब क्या है?

इस मुहावरे का मतलब है बहुत कम होने वाली घटना जैसे ‘ब्लू मून.’ यहाँ ब्लू मून से आशय नीले रंग के चंद्रमा से नहीं है. ब्लू मून का मतलब है साल में एक अतिरिक्त पूर्णमासी का होना. या किसी महीने में एक के बजाय दो पूर्ण चंद्र. इसी तरह एक मौसम में तीन के बजाय चार पूर्ण चंद्र. चूंकि ऐसा बहुत कम होता है इसलिए इसे मुहावरा बना दिया गया जैसे ‘ईद का चाँद.’ सामान्यतः एक कैलेंडर महीने में एक रात ही पूर्ण चंद्रमा दिखाई देता है. चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की काल गणना में संगति बैठाने के लिए प्राचीन यूनानी खगोल-विज्ञानी एथेंस के मेटोन ने गणना करके बताया कि 19 साल में 235 चंद्रमास (228 सौरमास) और 6940 दिन होते हैं. इस प्रकार 19 साल का एक मेटोनिक चक्र होता है. आपने देखा कि इन 19 साल में 234 चंद्रमास हैं जबकि कैलेंडर में 228 महीने हैं. इस प्रकार इन 19 साल में (234-228=7) सात अतिरिक्त पूर्णचंद्र होंगे. इस 19 वर्ष की अवधि में यदि किसी साल फरवरी में पूर्णमासी नहीं होती है (जैसाकि सन 2018 में होगा) तब एक ब्लू मून और बढ़ जाता है.

पिछला ब्लू मून 31 जुलाई 2015 को था. आगे की तारीखें इस प्रकार हैं 31 जनवरी, 2018, 31 मार्च, 2018, 31 अक्तूबर, 2020, 31 अगस्त, 2023, 31 मई, 2026, 31 दिसम्बर, 2028, 30 सितम्बर, 2031, 31 जुलाई, 2034. आपने गौर किया कि 31 जुलाई 205 के ठीक 19 साल बाद उसी तारीख यानी 31 जुलाई 2034 को ब्लू मून होगा.

नील आर्मस्ट्रांग ने चन्द्रमा पर अपना कौन सा पैर पहले बाहर रखा?

नील आर्मस्ट्रांग ने पहले बायां पैर बाहर निकाला और चंद्रमा की सतह पर रखा. उनका दायां पैर लैंडिग पैड पर ही था और कहा, "That's one small step for man, one giant leap for mankind." यह बात 21 जुलाई 1969 की है.

विश्व अध्यापक दिवस मनाने का फैसला कब हुआ? भारत में शिक्षक दिवस अलग क्यों है?

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन युनेस्को ने सन 1994 में निर्णय किया कि हर साल 5 अक्टूबर को विश्व अध्यापक दिवस मनाया जाएगा. तबसे यह मनाया जा रहा है. भारत में शिक्षक दिवस मनाने की परम्परा उसके 32 साल पहले ही शुरू हो चुकी थी. सन 1962 में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने. उस साल उनके कुछ छात्र और मित्र 5 सितम्बर को उनके जन्मदिन का समारोह मनाने के बाबत गए. इस पर डॉ राधाकृष्णन ने कहा, मेरा जन्मदिन यदि शिक्षक दिवस के रूप में मनाओ तो बेहतर होगा. मैं शिक्षकों के योगदान की ओर समाज का ध्यान खींचना चाहता हूँ. और तब से 5 सितम्बर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है.

बच्चों के मंदबुद्धि होने का क्या मतलब है? इसका कारण क्या होता है?

इसके कारणों पर आज भी एक राय नहीं है. चाहे वह जन्मजात कारणों से उत्पन्न हो चाहे रोग अथवा चोट से. स्टेनफर्ड-बिनेट परीक्षण में व्यक्ति की योग्यता देखी जाती है और अनुमान किया जाता है कि उतनी योग्यता कितने वर्ष के बच्चे में होती है. इसको उस व्यक्ति की मानसिक आयु कहते हैं. उदाहरणतः यदि शरीर के अंगों के स्वस्थ रहने पर भी कोई बालक अपने हाथ से सफाई के साथ नहीं खा सकता, तो उसकी मानसिक आयु चार वर्ष मानी जा सकती है. यदि उस व्यक्ति की साधारण आयु 16 वर्ष है तो उसका बुद्धि गुणांक (इंटेलिजेंस कोशेंट, स्टेनफर्ड-बिनेट) 4/16X 100, अर्थात् 25, माना जाएगा. इस गुणांक के आधार पर अल्पबुद्धि को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है. यदि यह गुणांक 20 से कम है तो व्यक्ति को मूढ़ (अंग्रेजी में ईडियट) कहा जाता है; 20 और 50 के बीच वाले व्यक्ति को न्यूनबुद्धि (इंबेसाइल) कहा जाता है और 50 से 70 के बीच दुर्बलबुद्धि (फ़ीबुल माइंडेड), परंतु यह वर्गीकरण अनियमित है, क्योंकि अल्पबुद्धिता अटूट रीति से उत्तरोत्तर बढ़ती है. मंदबुद्धि के कारणों का पता नहीं है. आनुवंशिकता (हेरेडिटी) तथा गर्भावस्था अथवा जन्म के समय अथवा बचपन में रोग अथवा चोट संभव कारण समझे जाते हैं. गर्भावस्था में माता को बीमारी या माता-पिता के रुधिरों में परस्पर विषमता के कारण भी ऐसा हो सकता है.

गोलमेज वार्ता क्या होती है?
गोलमेज वार्ता जैसा नाम है वह बताता है काफी लोगों की बातचीत जो एक-दूसरे के आमने सामने हों. अंग्रेजी में इसे राउंड टेबल कहते हैं, जिसमें गोल के अलावा यह ध्वनि भी होती है कि मेज पर बैठकर बात करना. यानी किसी प्रश्न को सड़क पर निपटाने के बजाय बैठकर हल करना. अनेक विचारों के व्यक्तियों का एक जगह आना. माना जाता है कि 12 नवम्बर 1930 को जब ब्रिटिश सरकार ने भारत में राजनीतिक सुधारों पर अनेक पक्षों से बातचीत की तो उसे राउंड टेबल कांफ्रेस कहा गया. इस बातचीत के कई दौर हुए थे. मेज का आकार यों तो कैसा भी हो सकता है, पर गोल रखने पर सभी पक्ष आमने-सामने आ जाते हैं.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Monday, October 26, 2015

बन रहे हैं रात में रोशनी देने वाले या चमकने वाले पेड़-पौधे

कुछ समय पहले अमेरिका और हॉलैंड के कुछ वैज्ञानिकों ने चमकदार पौधे बनाने का अभियान शुरू किया है। वे कामयाब रहे तो जल्द ही दुनिया की सड़कों पर बिजली के खंभों के स्थान पर रोशनी देने वाले पेड़ नजर आएंगे। वैज्ञानिकों ने जुगनू और इस तरह के रात में चमकने वाले जीव-जंतुओं के जीन पौधों में डाल दिए हैं। वैज्ञानिकों टीम ने पहले जीनोम कंप्लायर सॉफ्टवेयर से पौधे के डीएनए की पहचान की। इसके बाद आर्बीडोपसिस पौधे में जीन मिलाए गए। पौधों में जगमग उत्पन्न करने वाले जीन सिमेंस को 'लुसिफेरास' कहते हैं। जुगनू में इसी जीन सिमेंस से रोशनी पैदा होती है। जुगनुओं, जेली फिश व कुछ बैक्टीरिया के जीन में 'लुसिफेरास' नामक प्रोटीन एन्जाइम होता है। वैज्ञानिकों ने पहले इन जीवों से तकनीक की सहायता से खास किस्म का प्रोटीन एन्जाइम हासिल किया। फिर जेनोम कम्पाइलर नामक सॉफ्टवेयर बनाकर यह जांचा गया कि पौधे इस जीन को ग्रहण कर पाएंगे या नहीं। इसके बाद कई पौधों पर प्रयोग कर किया। अंतत: कुछ ऐसे पौधे बनाने में सफलता मिली है जो रात में चमकते हैं। पेड़-पौधों के बाद वैज्ञानिक चमकने वाले पक्षी बनाने का प्रयास भी कर रहे हैं।

इसके बारे में कुछ और जानकारी यहाँ से हासिल करें http://www.iflscience.com/plants-and-animals/bioluminscent-trees-could-light-our-streets

ओलंपिक के झंडे में कितने रिंग होते हैं और क्यों होते हैं?
इन पुराने खेलों की परम्परा में आधुनिक खेलों को जन्म देने का श्रेय फ्रांस के शिक्षाशास्त्री पियरे द कूबर्तिन को जाता है। आज चार तरीके के ओलिम्पिक खेल होते हैं। एक गर्मियों के ओलिम्पिक, दूसरे सर्दियों के ओलिम्पिक, एक पैरालिम्पिक, यानी शारीरिक रूप विकल खिलाड़ियों के ओलिम्पिक और एक यूथ ओलिम्पिक। ओलिम्पिक खेलों का सूत्रवाक्य है सिटियस, एल्टियस, फोर्टियस। इन लैटिन शब्दों का अंग्रेजी में अर्थ है फास्टर, हायर एंड स्ट्रांगर। माने तीव्रतर, उच्चतर और दृढ़तर। यानी नई से नई सीमाएं पार करो।

ओलिम्पिक खेलों का प्रतीक चिह्न है पाँच रंगों के पाँच वृत्त जो एक-दूसरे से जुड़े हैं। सफेद पृष्ठभूमि पर नीले, पीले, काले, हरे और लाल रंग के पाँच वृत्त दुनिया के पाँच महाद्वीपों प्रतिनिधित्व भी करते हैं। इन वृत्तों की रचना स्वयं कूर्बतिन ने 1912 में की थी, पर इन्हें आधिकारिक रूप से ओलिम्पिक चिह्न बनाने में समय लगा और पहली बार 1920 के एंटवर्प खेलों में इन्हें ओलिम्पिक ध्वज में जगह मिली। इस झंडे को आज भी एंटवर्प फ्लैग कहा जाता है।

जंतर-मंतर का निर्माण क्यों किया गया? क्या दिल्ली के अलावा यह कहीं और भी है?
जंतर-मंतर वेधशाला है। यानी अंतिरिक्षीय घटनाओं के निरीक्षण का स्थान। दिल्ली में इसका निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में करवाया था। यह इमारत प्राचीन भारतीय अंतरिक्षीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का अच्छा उदाहरण है। जय सिंह ने ऐसी वेधशालाओं का निर्माण जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी किया था। ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगाए गए हैं। सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की स्थिति की जानकारी देता है। मिस्र यंत्र वर्ष के सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिन को नाप सकता है। राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंडों की गति के बारे में बताता है।

रेलगाड़ी या बस में चलते हुए हमें बिजली के तार ऊपर-नीचे होते हुए क्यों नजर आते हैं?
तार तो अपनी जगह पर ही होते हैं, पर धरती की सतह पर वे समान ऊँचाई पर नहीं होते। सामान्य स्थिति में या धीरे-धीरे चलने पर हमें उनके उतार-चढ़ाव का ज्ञान नहीं हो पाता। हम तेज गति से चलते हैं तो उन तारों का ऊँच नीच हमें तेजी से दिखाई पड़ता है।
राजस्थान पत्रिका के नॉलेज कॉर्नर में प्रकाशित

अंपायर और रैफरी में क्या अंतर है?


अंपायर तथा रैफरी के मध्य अगर अंतर है तो वह क्या है?
एम.पी. वर्मा, एम.आई.जी-11, पदमनाभपुर, दुर्ग-491004 (छत्तीसगढ़) 


यह केवल खेल की शब्दावली का मामला है। इसका कोई सीधा कारण नहीं है। कुछ खेलों में जज भी होते हैं। खेल के विकास के साथ जो शब्द इस्तेमाल में आया वह चलता चला गया। मूलतः निर्णायक यह दो स्पर्धियों के बीच तटस्थ भाव से निर्णय तक पहुँचने में मददगार व्यक्ति रैफरी या अंपायर होते हैं। एक धारणा है कि हॉकी और फुटबॉल जैसे कॉण्टैक्ट गेम्स में रैफरी और क्रिकेट या बेसबॉल जैसे नॉन कॉण्टैक्ट गेम्स में, जिनमें खिलाड़ी एक-दूसरे से सीधे नहीं भिड़ते अंपायर होते हैं। पर यह बात भी पूरी तरह किसी एक खेल पर लागू नहीं होती। लॉन टेनिस में कुर्सी पर बैठने वाले अंपायर और लाइन पर खड़े रैफरी होते हैं। अमेरिकन फुटबॉल, जो हमारे देश में खेली जाने वाली फुटबॉल से अलग होती है रैफरी के साथ-साथ अंपायर भी होते हैं। इसी तरह क्रिकेट में जब अम्पायरों के अलावा एक और निर्णायक की जरूरत हुई तो उसे मैच रेफरी कहा गया। यह अंतर काम के आधार पर है और हरेक खेल के साथ बदलता रहता है।

नाटक को आगे बैठकर और फिल्म को पीछे बैठकर क्यों देखा जाता है?
अंशुला अग्रवाल, जैसमीनियम अपार्टमेंट्स, सेक्टर-45, फ्लैट नं.: 505, देहली पब्लिक स्कूल के पीछे, गुड़गांव-122003 (हरियाणा)


नाटक में आगे बैठे दर्शक अभिनेताओं की भाव-भंगिमा को बेहतर ढंग से देख सकते हैं। उनके संवाद भी आगे से ज्यादा आसानी से सुने जाते हैं। इसलिए रंगमंच में आगे की सीटें बेहतर मानी जाती हैं। सिनेमा के बड़े प्रेक्षागृह में दूर तक बैठे सभी दर्शकों तक तस्वीर और आवाज पहुँचाने के लिए जो व्यवस्था की जाती है, उसमें आगे बैठने वाले दर्शकों को पर्दे की तेज रोशनी, अस्वाभाविक रूप से बड़े चित्र और तेज आवाज मिलती है। यह असुविधाजनक होता है, इसलिए सिनेमा हॉल में पीछे की सीटें बेहतर मानी जाती हैं।

स्वतंत्रता के बाद पहले आम चुनाव में कितनी राजनीतिक पार्टियाँ मान्यता प्राप्त थीं। अब इनकी संख्या कितनी है?
कविता जैन, 19 अबुल फजल रोड, बंगाली मार्केट, नई दिल्ली-110001


सन 1951 के चुनाव में हमारे यहाँ 14 राष्ट्रीय और 39 अन्य मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2009 के लोकसभा चुनाव में 363 पार्टियाँ उतरीं थीं। इनमें 7 राष्ट्रीय, 34 प्रादेशिक और 242 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियाँ थीं। सन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग की 10 मार्च 2014 की अधिसूचना के अनुसार देश में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों की संख्या 6 थी और राज्य स्तर की मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 53 थी। इनके अलावा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 1593 थी।

कार्बन कॉपी की शुरुआत कब, क्यों और किसलिए हुई। इनके दैनिक जीवन में प्रयोग के बारे में बताइए?
मेवा लाल शर्मा, ग्राम: बीमापार हडवरिया चौक, पोस्ट: मेहदावल, जिला: संत कबीर नगर-272271


कार्बन कॉपी का मतलब है किसी दस्तावेज को तैयार करते वक्त उसके नीचे कार्बन पेपर लगाकर उसकी एक और प्रति तैयार करना। कार्बन का आविष्कार एक दौर तक दुनिया का महत्वपूर्ण आविष्कार था और उस जमाने में कार्बन पेपर को, जिसे कार्बोनेटेड पेपर भी कहते थे, स्टेशनरी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ था। हाथ से लिखने में और बाद में टाइपराइटर के इस्तेमाल के कारण कार्बन पेपर ने कम से कम दो सदी तक दुनिया पर राज किया। इस पेपर का आविष्कार इंग्लैंड के रैल्फ वैजवुड ने किया था। इसके लिए उन्होंने सन 1806 में पेटेंट हासिल किया था। उन्होंने इस पेपर को स्टाइलोग्रैफिक राइटर कहा। सन 1808 में इटली के पैलेग्रीनो तुर्री ने टाइपराइटिंग मशीन की ईज़ाद कर ली थी। टाइप मशीन में लगाने के लिए उन्होंने इसी किस्म के पेपर की ईजाद कर ली थी। वस्तुतः उन्होंने और वैजवुड ने भी नेत्रहीनों की लिखने में मदद करने के लिए आस तरह के कागज को बनाया था जो बाद में दस्तावेजों की प्रतियाँ बनाने के काम में आया। कागज के एक तरफ स्याही लगाकर उसे सुखाया। फिर किसी तख्ती पर नीचे कागज और उसके ऊपर कार्बन पेपर लगाकर और धातु की पट्टियों या तार क्षैतिज लगाकर उनके बीच धातु के या सैकड़ों साल से चले आ रहे परम्परागत कलम यानी पक्षियों के पंख के पीछे वाले कड़े हिस्से की मदद से नेत्रहीनों से लिखवाना उनका उद्देश्य था। तकरीबन यह योजना टाइपिंग मशीन में थी। पैलेग्रीनो तुर्री की प्रेमिका युवावस्था में किसी कारण से अपनी आँखें खो बैठी थी। उसकी मदद करने के प्रयास में यह मशीन बनी। इस प्रक्रिया में कार्बन पेपर भी तैयार हो गया।


कादम्बिनी के अक्तूबर 2015 अंक में प्रकाशित

Sunday, October 25, 2015

साबुन शब्द कहाँ से आया?

साबुन शब्द किस भाषा का है और इसका शाब्दिक अर्थ क्या होता है?
38, बैचलर्स आश्रम, निकट आईटी कॉलेज, निराला नगर, लखनऊ-20 (उ.प्र.)
हिन्दी शब्दों के मूल पर शोध करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार साबुन शब्द मूलतः यूरोपीय भाषाओं में इस्तेमाल होने वाला शब्द है। माना जाता है कि दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में साबुन शब्द पुर्तगालियों की देन है। एशिया-अफ्रीका-यूरोप में इसके साबू, साबन, साबुन, सेबॉन, सेवन, सोप, साबौन, सैबुन, सबुनी आदि रूप मिलते हैं जो भारत की तमाम भाषाओं सहित अरब, इराक, ईरान, मलेशिया, श्रीलंका, सिंगापुर, कम्बोडिया, जावा और जापान आदि क्षेत्रों की विभिन्न बोलियों में प्रचलित हैं। उनके अनुसार दक्षिण-पूर्वी एशिया में चाहे साबुन शब्द पुर्तगालियों के जरिए पहुंचा होगा परंतु भारत में इसके पीछे पुर्तगाली नहीं रहे होंगे। यह मानने का कारण है कबीर का यह दोहा- निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छबाय। बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय।।

भारत में वास्को डी गामा पहला पुर्तगाली माना जाता है जो 1498 में कालीकट के तट पर उतरा था। जबकि कबीर का जन्म इससे भी सौ बरस पहले 1398 का माना जाता है। कुछ विद्वान उन्हें 1440 की पैदाइश भी मानते हैं तो भी साफ है कि पुर्तगालियों के आने से पहले कबीर साबुन शब्द का प्रयोग कर चुके थे। कबीर के वक्त तक हिन्दी में अरबी-फारसी शब्द घुल-मिल चुके थे। लगता है कि हिन्दी में साबुन शब्द अरबी-फारसी के रास्ते आया है।  

साबुन के मूल रूप में एक शब्द सोप भी है जो अंग्रेजी का है। यह पुरानी अंग्रेजी में सेप था। प्रोटो जर्मेनिक में सेपॉन, डच में ज़ीप। इसमें धुलाई, धार, टपकना आदि भाव समाए थे। फ्रेंच में इसका रूप है सेवन। लैटिन में इसका रूप हुआ सैपो-सैपोनिस। अर्थ है खिज़ाब या हेयर डाई। लैटिन से यह शब्द ग्रीक में बना सैपोन। इतालवी में सैपोन और स्पेनिश में जबॉन बना। अरबी में बना साबुन और हिब्रू में सैबोन। पुर्तगाली में लैटिन से गया सैपो शब्द सबाओ बना। भारत की पश्चिमी तटवर्ती भाषाओं कन्नड़ कोंकणी, मराठी, गुजराती में इसके सबाओ, साबू, सबू जैसे रूप भी हैं जो इस इलाके पर पुर्तगाली प्रभाव बताते हैं। शेष भारत में अरबी रूप साबुन ही प्रचलित हुआ। अरबों से भारत के कारोबारी रिश्ते काफी पुराने हैं, पर साबुन शब्द संस्कृत ने ग्रहण नहीं किया।

विनोबा भावे के बारे में कृपया विस्तार से बताइए? उनके योगदान को युवा पीढ़ी कितना विश्लेषण कर आत्मसात कर पाई है?
अशोक कुमार ठाकुर, ग्राम: मालीटोल, पोस्ट: अदलपुर, जिला: दरभंगा (बिहार)
आचार्य विनोबा भावे (11 सितम्बर 1895 - 15 नवम्बर 1982) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा महात्मा गांधी के अनुयायी थे। स्वतंत्रता के बाद चलाए गए भूदान आंदोलन के लिए उन्हें खासतौर से याद किया जाता है। उनका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। नरहरि उनके पिता का नाम था। विनोबा नाम गांधी जी ने दिया था। महाराष्ट्र में नाम के पीछे ‘बा’ लगाने का चलन है। वैसे ही जैसे तुकोबा, विठोबा और विनोबा। विनोबा ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष पुनार, महाराष्ट्र के आश्रम मे गुजारे।
महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में उनका पैतृक गाँव है, गागोदा। 1915 में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की। उन दिनों इंटर की परीक्षा के लिए मुंबई जाना पड़ता था। विनोबा 25 मार्च 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए। उस समय उनका मन डांवांडोल था। पूरा विश्वास था कि परीक्षा पास कर ही लेंगे, पर उसके बाद क्या? जब गाड़ी सूरत पहुंची, विनोबा उससे नीचे उतर आए। दूसरे प्लेटफॉर्म पर पूर्व की ओर जाने वाली रेलगाड़ी खड़ी थी।
विनोबा को लगा कि हिमालय उन्हें आमंत्रित कर रहा है। हिमालय की ओर यात्रा के बीच में काशी का पड़ाव आया। जिन दिनों विनोबा सत्यान्वेषण के लिए काशी में भटक रहे थे, उन्हीं दिनों भारत को पहचानने और उससे आत्मीयता का रिश्ता कायम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका से भारत आए महात्मा गांधी देश का भ्रमण करने निकले थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुए एक सम्मेलन में गांधी जी ने धनवानों से कहा कि अपने धन का सदुपयोग राष्ट्र निर्माण के लिए करें। उसको गरीबों के कल्याण में लगाएं। यह क्रांतिकारी अपील थी। विनोबा ने समाचारपत्र के माध्यम से गांधी जी के बारे में जाना। उन्हें लगा कि जिस लक्ष्य की खोज में वे घर से निकले हैं, वह पूरी हुई।
उन्होंने गांधी जी के नाम पत्र लिखा। जवाब आया। गांधी जी के आमंत्रण के साथ। वे अहमदाबाद स्थित गांधी जी के कोचरब आश्रम की ओर रवाना हो गए। 7 जून 1916 को विनोबा की गांधी से पहली भेंट हुई। उसके बाद वे गांधी जी के ही होकर रह गए। बाद में गांधी जी ने उन्हें वर्धा आश्रम में भेजा। बहुत ज्यादा काम करने के कारण जब उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और किसी पहाड़ी स्थान पर जाने की डाक्टर ने सलाह दी, तब 1937 में वे पवनार आश्रम में गए। तब से जीवन पर्यन्त उनका यही केन्द्रीय स्थान रहा।
विनोबा ने सन 1951 में भूदान आंदोलन शुरू किया। यह स्वैच्छिक भूमि सुधार आन्दोलन था। वे चाहते थे कि भूमि का पुनर्वितरण केवल सरकारी कानूनों के जरिए नहीं हो, बल्कि एक आंदोलन के माध्यम से इसकी कोशिश की जाए। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की। 18 अप्रैल 1951 को जमीन का पहला दान मिला था। उन्हें यह जमीन तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में मिली थी। विनोबा पदयात्राएं करते और गांव-गांव जाकर बड़े भूस्वामियों से अपनी जमीन का कम से कम छठा हिस्सा भूदान के रूप में भूमिहीनों के बीच बांटने के लिए देने का अनुरोध करते थे। तब पांच करोड़ एकड़ जमीन दान में हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था जो भारत में 30 करोड़ एकड़ जोतने लायक जमीन का छठा हिस्सा था। मार्च 1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से भी अधिक जमीन बतौर दान मिल चुकी थी। पर इसके बाद आंदोलन का बल बिखरता गया।

विनोबा ने जब देख लिया कि वृद्धावस्था ने उन्हें आ घेरा है तो उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। उन्होंने कहा, मृत्यु का दिवस विषाद का नहीं उत्सव का दिवस है। उन्होंने अपनी मृत्यु के लिए दीपावली दिन चुना। अन्न जल त्यागने के कारण एक सप्ताह के अन्दर 15 नवम्बर 1982 को  वर्धा में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। युवा वर्ग ने उनकी शिक्षा को कितना आत्मसात किया, कहना मुश्किल है। लगता है काफी लोगों का उनके जीवन से परिचय भी नहीं है।
कादम्बिनी के सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित